प्रभु लाज रखो मेरी,  हाथ जोडे निरीह आंखे बंद आंसुओं की धार  एक अबला,   कृष्ण भक्ति में लीन,  विश्वास की परकाष्ठा,, पंचाली कृष्णा, कृष्ण है, न तुम्हारा सखा "
धीरे से नयन खोलकर देखती है, अद्भुत, सामने केशव खड़े, बस उन्माद, कुछ खबर नही "! 
हडबडा उठ बैठी नित्या, कुछ पल इधरउधर देखती रही, अखिर ये कैसा दुर्लभ स्वप्न था! 
हा स्वप्न ही तो था! पर इस स्वप्न का आना" कोई संदेश तो नही "
सोच में पड गयी नित्या, सुबह का स्वप्न कुछ अनमना सा हो गया मन,! 
मैडम नौ बज चुके है, अभी बैड पर हो, पास आकर माथे पर हाथ रखते हुए बोले, विवेक जी, फीवर तो है नही " मै सुबह छह बजे का गया हुआ, आधे काम निपटा कर आ गया, और आप भी नित्या जी कमाल करती है! चलिए ऊठिऐ"
विवेक आज न मैंने सपने में, पंचाली, वस्त्र,,,  उफ आपके सपने, धरातल पर आईऐ "नित्या जी,विवेक जी वाशरूम की ओर बढ गये! आगे नित्या कुछ न बोली, बालों को समेट, किचन की ओर बढ गयी! 
ये काम वाली रोज देर से आती है, अकेले ही बडबडाने लगी! 
मैम साहब, चलो अच्छा है तुम   आ गयी, फीकी मुस्कान से बोली नित्या"
मैम साहब आपकी तबियत खराब है क्या,, नही तो, क्यूँ, 
मुझे ऐसा लगा, वो आज न, कुछ नहीं, बोलकर चुप हो गयी, नित्या "
बाहर शोर हो रहा था, 
नित्या बालकनी की ओर बढ गयी! 
बाहर झांककर देखा कुछ समझ न आया, वो वापस किचन में आ गयी! विवेक के लिए नाश्ता तैयार करना था! 
फिर से कोलाहल की आवाजें गूंजने लगी "
मंजू जरा देखा नीचे, से इतनी  आवाज़ें क्यूँ आ रही है! 
मंजू तीर के जैसे फंलागे मारते हुए सीढियाँ ऊतर गयी! 
विवेक जी के आते ही, पनीर के गरमागरम पराठे तैयार हो चुके थे, वाह बडी अच्छी खूश्बू आ रही है! 
विवेक जी नाश्ता करने बैठ गये! आपके युवराज उठ गए, या आप जैसे, बात पूरी होने से पहले, मंजू ने हफते हुए कदम रखा उसकी सांस फूल रही थी! 
विवेक पर नजर पडते ही ठिठक गयी! नित्या ने उसे चुप रहने का इशारा किया! 
विवेक जी नाश्ता कर अपने रूम में चले गए,, हा बोल, मंजू  से पूछा नित्या ने,
मैडम वो पडोस की उमा चाची है न, हाथ नचाते हुए बोली मंजू, 
हा तो, पहले बता तो हुआ क्या, उतावले पन से बोली नित्या, 
वो सबपर इल्जाम लगाती थी! रात उनकी बहू भाग गयी! 
बहू भाग गयी आश्चर्य हुआ नित्या को, धत ऐसा थोड़ी होता है, 
अब क्या बताये मैडम,  उसकी लीला वही जाने, 
सबको पता है, उमा चाची, बहू से चिढती हैं, और बहू से तलाक चाहती है! 
भला क्यूँ, कभी बेटा बात करता है, तो कहती हैं, की बहू, ने जादू कर रखा है! सुदंर तो है ही, उमा चाची जलती होगी "
एक बात बताऊँ मैडम जी, कही उमा चाची ने उसके साथ कुछ गलत तो नहीं कर दिया, फुसफुसाते हुए बोली मंजू, 
अरे नही रे, नित्या बोली, अंदर की खबर है "मंजू बोली, 
नित्या "अरे वो नित्या ,,,पडोस की ताई ने आवाज लगायी, नित्या बात करने में मशगूल थी! 
देख बाहर पुलिस आयी है! नित्या के हाथ से फोन छूट गया! 
वो बाहर की ओर लपकी, बाहर का नजारा अविश्वसनीय था! 
उमा चाची के हाथ में हथकडी लगी थीं! 
कुछ देर में पुलिस की गाड़ी, उमा चाची को लेकर आंखों से ओझल हो गयी! 
ताई ये सब क्या था! नित्या तू कौन सी दुनिया में रहती है! 
वही एक स्त्री का एक स्त्री से डाह, उमा ने बहू के भागने की बात मोहल्ले में फैला दी, पर उसका उल्टा उसकी लाश आज बोरे में बंद पार्क में मिली, क्या बताये, सच्चाई तो ये है, उस बच्ची को एक दिन भी सुकून से जीने न दिया! 
मासूम सी पिकीं जबसे बहू बनकर आयी उसपर हमेशा नजर रखती,  बेटे को पास जाने भी नहीं देती, और बच्चे न होने का ताना रोज मारती, अभी पिछले महिने खुश खबरी थी, तो बोली की बदचलन है,! पिकीं रो रोकर गिडगिडाती रही पर उसे दया न आयी, अब क्या कैसे हुआ सच्चाई भगवान ही बता सकते है!! 
अगले दिन, पेपर की न्यूज चौका देने वाली थी! 
पुलिस की मार से उमा चाची कुछ घंटे में ही टूट गयी! सब सच सच उगल दिया! उमा चाची का बेटा शरद, रिश्ते की किसी और लडकी से प्यार करता था! पर दयाल चाचा के सामने किसी की न चली, पिकीं घर की बहू बन गयी! 
सात महिने पहले दयाल चाचा की एक्सीडेंट मे मौत हो गयी, पिकीं को रास्ते से हटाने मे माँ बेटे ने कोई कसर न छोडी, 
बेटे की दूसरी शादी में मिलने वाला था करोड़ों का दहेज, जिसके लालच ने उमा चाची को अंधा कर दिया था! 
जिसका परिणाम सामने था, उमा चाची ने हर प्रयास कर लिया पिकीं को घर से निकालने मे, पर वो घर से न निकली,जिसका अंत अंतहीन था! एक औरत  ही औरत का दोहन करती आयी है, इस बात का इतिहास गवाह है! समाप्त "
श्रीमती रीमा ठाकुर सहित्य संपादक "
राणापुर झाबुआ मध्यप्रदेश भारत"