जिंदगी में सपनों का घर बनाना है
हर गैर मे भी अपनत्व को जगाना है
हो कितना भी ऊंचा मुकाम मेरा पर
अपनों के आगे सदा झुक कर ही चलना है
न अहम धन दौलत का हो किसी में ऐ खुदा
अपने में ही क्या गैरों में भी इन्सानियत को जगाना है
घर का क्या है वो तो बन ही जायेगा मगर
दिल में इन्सानियत का महल बनाया है
हो मुझमें अपने पन का तेज हे ईश्वर मगर
अपने तेज से संसार को भी रौशन बनाना है
स्वेता मिश्रा

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