थाम कर हौसला
बुलंद कर मन को
उतरता है वीर पिता
लेकर निर्बीज बीज
आशाओं और उम्मीद लिए
मिट्टी में डालकर बीज जतन से
सींचता है अपने स्नेह और जल से
जब धरती की कोख से फूटतीं हैं
नवपल्लवित पादपें
सफल हो जातीं हैं साधना
उस पिता कृषक की ।।
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स्वरचित
सीमा प्रियदर्शिनी सहाय
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