हर पल रखता था जो हर खबर दिल की,
बार बार टकराती जिससे नजर
मगर नहीं मिलती,
जाने क्या सोच थी समझ न आई
उसकी,
मगर मुस्कान बड़ी कातिल लगी उसकी,
मुहं पर मुखौटा लाज़मी था जिसके,
पता नहीं दिल में छिपा क्या? 
राज था उसके,
क्यों वो सामने होकर भी सामने न आया।
इंसान था या साया समझ नहीं आया।
भाव जिसके दिल का हो सका न महसूस था।
हां वही शायद मेरे इश्क़ का  जासूस था।
इंदु विवेक उदैनियाँ
स्वरचित