अपनी आजादी के संघर्षों को याद कर आओ गणतंत्र पर्व मनाएं ।
शहीदों को भाव भीनी श्रद्धांजलि देकर आओ तिरंगा फहराएं।

पर फहराते तिरंगे के नीचे जाने क्यों मन बहुत चिंतित है ।
क्या शहीदों के वतन का असली गणतंत्र प्रतिबिंबित है ?

छूट पाएं हैं क्या हम अपने बंधनों से,अपने कुविचारों से ?
क्या आजाद हो पाएं हैं जीवन के दिखावटी प्रकारों से ?

नहीं ,हम अब भी नहीं स्वतंत्र सामाजिक ऊंच नीच के भाव से।
दिखता है अंतर भी भाषाई और धर्म के नाम पे पलता चाव से।

हम सब अब भी दास बने हैं छुआछूत जाती- पाती के ।
जो दिन ब दिन अंदर से और हमें खोखली करती जाती है।

सोचने समझने की क्षमता को हमने गिरवी रख दिया ।
बेटियों को पिंजरे में कैद कर स्वतंत्र होने का दंभ भर लिया।

अपूर्ण लोकतंत्र की गढ़ी हमने अब तक की परिभाषा है।
जबकि आधी आबादी के मन में अभी भी स्वतंत्र होने की आशा है।

सही मायने में हमारे तिरंगे की रंगत विश्व पटल पर तब छाएगी।
जब खुले विचारों के संग नमन कर शहीदों की यशोगाथा गाई जाएगी।

जय भारत 🙏
         स्वरचित व मौलिक --
     कीर्ति रश्मि " नन्द"
            ( वाराणसी)