सुबह का उठना छूट गया,
कुल्ला दातून को भूल गया,
    कुछ ना रहा अब पहले सा ।।

आलस आया व्यायाम गया
उच्च विचारों का आयाम गया,
     कुछ ना रहा अब पहले सा ।।

माता-पिता को सम्मान कहाँ
सर के ऊपर से अभिमान गया,
      कुछ ना रहा अब पहले सा ।।

शिक्षा-भिक्षा बने व्यापार अंग,
लोगों का नैतिक आधार गया,
          कुछ ना रहा अब पहले सा ।।

स्त्री को बस भोग्या समझा,
चरित्रहीनों में व्यभिचार गया।
       कुछ ना रहा अब पहले सा ।।

मित्र-भेष में शत्रु छिपे हैं,
वो भाई-चारा और प्यार गया,
      कुछ ना रहा अब पहले सा ।।

झूठे-मक्कारों के शासन में,
सच्चाई का तो अधिकार गया,
     कुछ ना रहा अब पहले सा ।।

गलत काम करके इठलाते,
दिल से लानत-धिक्कार गया,
     कुछ ना रहा अब पहले सा ।।

कुकर्मी लोग हैं संत बने,
भक्तों का बत्सल संसार गया,
       कुछ ना रहा अब पहले सा ।।

लोभ-काम-ईर्ष्या-वासना,
जीवन से हरेक संस्कार गया,
      कुछ ना रहा अब पहले सा ।।

दुष्टों का है सम्मान बढ़ा,
कुटिलों-धूर्तों का प्रासार गया,
       कुछ ना रहा अब पहले सा ।।

पिता-पुत्री की मर्यादा बदली,
    माँ-पुत्र का स्नेह आभार गया,
          कुछ ना रहा अब पहले सा ।।

अश्लील हुए हैं संवाद कई,
विश्वास के धागे का भार गया,
        कुछ ना रहा अब पहले सा ।।

बीभत्स हो रही मानवता,
कर्णों में रूदन हाहाकार गया,
          कुछ ना रहा अब पहले सा ।।

झूठों की इस संसद में
आज सच कितना लाचार गया,
          कुछ ना रहा अब पहले सा।।

छल-कपट की होती उपासना
अच्छे कर्मों का फल बेकार गया, 
          कुछ ना रहा अब पहले सा।।

अब क्या काबा और क्या काशी
संतों की संगत में व्यभिचार गया,
           कुछ ना रहा अब पहले सा।।


रचनाकार - अवनेश कुमार गोस्वामी