पहले का दिन था बड़ा सुहाना।
लगभग रोज ही खत आता था।

घर छोड़ पहली बार थे निकले।
नौकरी ज्वाइन करने जाना था।

लिखते थे पत्र में हाल वहाँ का।
निज हाल जो घर पहुंचाना था।

लैंड लाइन भी उतना नहीं रहा।
उस जमाने में  जिससे बात हो।

खतो किताबत ही मात्र सहारा।
जिससे ही घर वालों से बात हो।

कभी पिता कभी माँ के ये खत।
पोस्टमैन इसे देने जो आता था।

पाते ही पत्र अपनों का दिल में।
याद मुझे वह घर आ जाता था।

पढूँ पत्र हालचाल मिले घर की।
मन में उठे तरह-2 के भाव मेरे।

खत का उत्तर लिखूँ समय पर।
घरपरिवार को जो थे भाव मेरे।

पोस्टकार्ड अंतर्देशीय पत्र एवं।
यह लिफाफा भी रहाहै पुराना।

तब ये मोबाइल नहीं आया था।
अर्जेंट में तार भेजना है पुराना।

शादी हुई पत्नी को खत लिखे।
बड़े प्रेम प्यार की है बात किये।

उत्तर आने के इंतजार में रहता।
खत पढ़े बिना पत्नी की रहता।

मिले जब खत पत्नी का आता।
पढ़ करके मन उमंग भरा रहता।

खतों का ये जो आना जाना था।
इसका ये1995तक जमाना था।

मैंने96में लिखा है आखरी खत।
पापा-मम्मी व पत्नी को है खत।

उसके बाद आया उषा का फोन।
उषाटावर से जुड़े नोकिया फोन।

मैंने भी ले लिया मोबाइल फोन।
जब चाहो बात कराए यह फोन।

अब पत्रों का ना आना जाना है।
अब तो मोबाइल का जमाना है।

सरकारी पत्र  रजिस्ट्री आना है।
मेल व्हाट्सएप मैसेज आना है।

पत्र लिखे हुए जमाने बीत गये।
वो दिन पुराने सुहाने बीत गये।

चिट्ठी पढ़वाने लोग यहाँ आते।
हाल सुनाने का दिन बीत गये।

वही1996 में है आखरी खत।
अपनों को लिखा ये मेरा खत।

माँ-बाप नहीं धरती पर अब हैं।
उनका लिखा सुरक्षित है खत।

मेरी पत्नी भी संजो के रखी हैं।
अपने प्रियतम के प्यारे वे खत।


रचयिता :
डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पीबी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.