बैठ कर अपनी खिड़की पर,
बाहर मैं जब भी देखती हूँ.....
आशाओं से भरी आँखों से,
सारा आसमान देखती हूँ.....
सरस,मधुर आवाज़ पंक्षियों की,
दिल को मेरे छू जाती हैं.....
शीतल,शांत हवायें देखो,
छू कर मुझे इठलाती हैं.....
फूलों से आती सुगंध,
मेरा रोम-रोम म़हकाती है.....
देख अली की अठखेलियाँ, उन फूलों पर,
मेरा अंतर्मन यह पूछता है,
क्या तेरा ये चंचल मन,
तुझे उड़ने को ना क़हता है.....?
मैं क़हती फिर उससे,
मेरा मन भी है उड़ने का.....
आसमान में पंख फैला कर,
बादलों को चूमने का.....
पर डर लगता है इस दुनिया से,
ये ना समझेंगे मेरे सपनों को.....
जकड़ मर्यादा के पिंजड़े में,
काट देंगे मेरे पंखों को.....
बस यही सोच फिर मन मेरा,
कुछ यूँ सहम सा जाता है,
चंचलता को बांध गठरी में,
कोने में दबाता है.....
आकर फिर साथ मेरे यह 
खिड़की पर बैठ जाता है.....
देख नीला,खुला आसमान,
ये स्वप्न नये सजाता है.....
बन्द कर इन्हें फिर आँखों में,
चुप होकर सो जाता है.....
मन मेरा ये खिड़की पर,साथ मेरे जब आता है.....