वो आखिरी मुलाक़ात थी उसकी कह रही थी अब न मिल सकूँगी!!

राज़ गहरे है इस दिल में ; जो अब यहीं दफ़न कर दूंगी!!

न देखना कभी मुड़कर भी मुझे ;मिल जाऊं गर कभी भरी भीड़ में तुझे!!

प्यार था !! हाँ था ..तुझसे!!!..... लेक़िन ज़माने को बतला सके इतना ऐतबार भी तो न था।।

हर कोशिश सिर्फ़ मेरी थी 
तेरा तो इक इक़रार भी न था!!

मुड़कर जब भी देखेगा तू
तन्हा ही बस ख़ुद को पायेगा!!

होगा सारा समंदर तुझमें 
लेक़िन प्यासा ही तू रह जायेगा!!

भड़का के प्यार के शोले कदम पीछे हटा गया
ख़ुद में कितना तन्हा था वो
दूर होकर ये बतला गया!!

अब न सोचूंगी तुझे न कभी कोई जिक्र होगा तेरा
बात वफ़ा की आएगी तब तेरी जुवां पर नाम होगा बस मेरा!!

भेज रही हूं तुझे अपना ये हाले दिल ...जानती हूं न कह सकेगा तू!!

चाहत तो दोनों ने ही की थी इज़हार भी हम दोनों का था
मुकरना तो तेरी फ़ितरत थी बस हम ही नासमझ सके!!

तेरा साथ तो पलभर का था
हम अंजामे मुहब्बत कर बैठे!!

 भेज रही हूँ हाले दिल अपना..... हिम्मत हो तो तू भी कह देना आख़िरी ख़त लिख कर मुझे!!
 
 एकता श्रीवास्तव  ✍️