स्वदेश एवं स्वदेशी होने में गर्व सम्मान भरा है, 
निज देश ही ये गौरव है आत्म सम्मान भरा है।

देश स्वदेश के खातिर ही है एक अलख जगाई,
वीर सपूतों भारत के युवाओं ने ली है अंगड़ाई।

1857में छिड़ी है स्वदेश हेतु क्रांतिकारी लड़ाई,
90साल जंग बाद स्वदेशी आजादी ख़ुशी आई।

1947 में स्वदेश यह भारत देश बनगया स्वतंत्र,
स्वदेशी वीर जवानों दीवानों ने तोड़ा है षड्यंत्र।

अबनहीं रहेगा स्वदेश ये अंग्रेजों का बन परतंत्र,
स्वदेशी संग्राम सेनानियों ने फेल किया षड्यंत्र।

अंग्रेजों से लोहा लेते कितने वीरों ने जान गँवाई,
इसे बनाये रखना जो मुश्किल से आजादी पाई।

झूले कितने हैं फांसी पर,परतंत्रता स्वीकार नहीं, 
आजादी के दीवानों को ये अंग्रेजी स्वीकार नहीं।

ब्रिटिश अत्याचार छल-कपट से लेते रहे हैं लोहा,
हँसते-2 प्राण गवाएं राष्ट्रप्रेम स्वदेश के गा दोहा।

हमें मिली स्वदेशी आजादी है जश्न मनायें आज,
श्रद्धा फूल समर्पित कर उनको नमन करें आज।

राष्ट्रप्रेम की शिक्षा भी लें इन पूर्वजों के त्याग से,
व्यक्ति विशेष बड़ा ना होता स्वदेश के ताज से।

सर्वोपरि है स्वदेश सदा ये जाति धर्म समाज से, 
इसे बचाना बंधुओं निज कटुता के हर आग से।
 
रहे स्वदेश विश्व में ऊँचा तिरंगे झंडे की ये शान,
भारतवासी को प्यारा होना चाहिये देश महान।

कहीं के भी नहीं रहोगे यदि न रहा ये हिंदुस्तान,
गंगाजमुनी संस्कृति अपनी यहाँ सभी का मान।

सोने की चिड़िया थी कभी ये भारत देश अपना,
वसुधैवकुटुम्बकम की सोच सदा रखना सपना।

हर चीज स्वदेशी अपनाएं  देश का करें विकास,
स्वदेशी खाएं स्वदेशी पहनें स्वदेश का विश्वास।

स्वदेश के जैसा कहीं नहीं है दुनिया में ये सौंदर्य,
धर्म संस्कृति संस्कार सभ्यता प्राकृतिक सौंदर्य।

धरती अम्बर वन उपवन हिमगिरि झरना सरिता,
देवीदेवता महापुरुष त्याग बलिदान की कविता।

खान पान पहनावा रहन सहन है कितना प्यारा,
पर्व त्यौहार मूल्य मान्यता सब कुछ बड़ा न्यारा।

स्वदेश का हर पावन पर्व ये हर्षोल्लाष से मनायें,
भारत का रहने वाला ये स्वदेश का ही गुण गायें।

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई सभी तो इसकी जान,
रंग-2 के फूल सभीहैं स्वदेशी गुलदस्ते की शान।

स्वाभिमान भरो स्वदेश का यह देश अपनी जान,
ये सुंदर भारत है अपना प्राण से प्यारा हिंदुस्तान।


रचयिता :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पीबी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.