मैं तुम से दूर ही सही तुम भी मेरी यादों को खुद से दूर ही रखना, मेरे ख्वाबों में भी अब तुम्हें आने की कोई जरूरत नहीं....!
तुम रहने दो अपना मरहम अपने पास मुझे अब इसकी कोई जरूरत नहीं....!!

ग़र गलती से भी कोई किया गया वादा तुम्हें याद आएं तो उसे कसम मेरी दे देना तुम्हें मुझे झूठा दिलासा देने की कोई जरूरत नहीं....!!!

मैंने कर ली है दर्दों से दोस्ती तन्हाई, उदासी, ये सब मेरी पक्की सखियां अब बन गई है ये सब मेरे साथ ही रहती है मुझे अब तुम्हारे प्यार की कोई जरूरत नहीं....!!!!

तुम बना लेना अपना आशियाना, खुशियों की तुम पर बहार हो दुआ मैं यही करती हूं। मैं जी लूंगी बिना तुम्हारे मुझे अब धरती और आसमां की कोई जरूरत नहीं....!!!!!

               कु. आरती सिरसाट
             बुरहानपुर मध्यप्रदेश
       मौलिक एंव स्वरचित रचना।