सच मे नारी के अनेक रुप है, 
      माँ, बहन, पत्नि, बेटी, 
नारी ही ममता की मूरत, सच की सूरत है, 
भाई की सजाती कलाई, फिर भी कहलाती पराई है, 
घर मे लगी आंगन की तुलसी, तो घर की लक्ष्मी है, 
               गंगा की पवित्र धारा , 
तो घर को सम्हालने वाली अमृत का प्याला, 
पुरुष के जैसी नहीं, पर पुरूषों   से कम नहीं, 
शक्ति और ममता की गागर,
 प्रेम, करूणा की सागर, 
जगजननी, भी है वरदानी भी है, 
नौ रात्रि मे नौ रूपों मे पूजी  जाती है, 
पर नौ नहीं अनेक रूप नारी के है, 
शक्ति से है परिपूर्ण, पर न करती अभिमान
     नारी से ही है संसार  
नारी ही शिव की गौरी, 
तो काली बनकर करती दुष्टों का संहार l
सच मे नारी के है अनेक रूप।।