चूड़ी कंगन,पायल ,बिंदिया,
सब गुजरे जमाने की बाते है,,,,,
जब से होश संभाला है,
खुद को स्वेत रंग में जाना है।।

अभी तो गूँजी थी,
मेरी चूड़ियो की खनखनाहट,
अभी  तो पैजन ने मेरे
पूरे घर शोर मचाया था।
अभी मेरे साजन ने
मेरा का हाथ थामा था।।

  करके सोलह श्रृंगार,
अभी तो मैं सुहागन बनी थी,
आँखो में भरकर सपने नए जीवन के,
अभी तो पिया जी अंगना चली थी।।

न जाने किसकी नजर लग गयी,
मेरे सपनों के संसार को,
चूड़ी बिंदिया पायल कगंन,,
अब रहे न मेरे किसी काम के,

अल्हड़ सी उमर में,
मैं जो ब्याही गयी थी,
मोल भी न मैं ब्याह का 
जान पाई थी।
न श्रृंगार का अर्थ समंझ पाई थी,।।

छूट गया सब साजो श्रृंगार मेरा
एक पल में ,
तेरे बिन सब अधूरे सजना,
अब सब गुजरे जमाने की बात।।


सुमेधा शर्व