Home
About
Contact
Privacy policy
रश्मिरथी
मुख्य पृष्ठ
मासिक प्रशस्तिपत्र
रचनाएं भेजें
हमारे विषय में
मुख्यपृष्ठ
Rashmirathi
"तुम्हारा शहर"
"तुम्हारा शहर"
फ़रवरी 02, 2022
अंजाना होकर भी
जाना पहचाना सा लगा...
क्यूं तुम्हारा शहर
अपना सा लगा...
कभी तुम से ना कोई
राबता ही रहा...
फिर क्यूं तुम्हारे शहर से
वास्ता सा रहा...
कविता गौतम...✍️
कविता गौतम...✍️
एक टिप्पणी भेजें
0 टिप्पणियाँ
0 टिप्पणियाँ