मृत्यु भोज यह एक बुरी प्रथा है।
अब तो ये बंद होना ही चाहिए।।

स्वजनों को जिसने भी खोया है।
समझाना उन्हें भी हमें  चाहिए।।

इधर तो घर में इतना कष्ट पड़ा है।
उधर मृत्युभोज भी होना चाहिए।।

संकट की घड़ी में सब छिन्न भिन्न।
पर समाज में मृत्यु भोज चाहिए।।

किसने मृत्यु भोज की रीति बनाई।
यह बिलकुल उचित नहीं है भाई।।

कष्ट में हैं जिसके आँखों में आँसू।
पोंछ सको तो उसको पोंछो भाई।।

चला गया जो उसे नहीं है मिलता।
कितना भी दें उसके नाम से भाई।।

यह तो है केवल घर फूँक तमाशा।
बंद करें इसको मिलके सब भाई।।

जीते जी सेवा करना ही अच्छा है।
जितना करोगे दुआ मिलेगी भाई।।

लाक डाउन में और असर पड़ा है।
कोई नहीं  जा सका कहीं है भाई।।

न कहीं मित्र न किसी रिश्तेदारी में।
न समाज न वर्ग की भागीदारी में।।

ऐसे समय में सबसे ज्यादा जरूरी।
परिवार के दुःख में हो भागीदारी।।

सामाजिक दूरी भी रखना जरूरी।
जीवन सुरक्षित रखना था जरूरी।।

ये प्रथा पुरातन और रूढ़िवादी भी।
कोई भी नहीं चाहता है ये जरूरी।।

कठिन बहुत एवं यह है कष्टकारी।
मजबूरी में सहते हैं पड़ता सहना।।

सच तो यही है जो मैं कहता भैया।
किया क्या जाए समाज में रहना।।

दुनिया देखो है कितनी बदल गयी।
ये लकीर के फ़क़ीर पीटते हैं ढ़ोल।।

इस मृत्यु भोज की प्रथा पर करना।
हमें चाहिए समाज से करना पोल।।

दिल से मेरी बिलकुल नहीं ये मंशा।
विचार से कोई कहीं से आहत हो।।

मन में मात्र मेरे है इतनी अभिलाषा।
यदि ये बंद हो तो कितनी राहत हो।।

विनती है सभीसे मेरे निज विचार हैं।
इसपे गौर करें क्या आपभी तैयार हैं?



रचयिता :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पीबी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
वरिष्ठ समाजसेवी-राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगठन