मानसिक शारीरिक आघात कर 
अपना दंभित पुरुषुत्व का रूप दिखाते हो 
जिस हृदय में बसता असीम प्रेम तुम्हारे लिए 
उसे ही बड़ी निर्लज्जता से भावविहीन कर जाते हो
क्या यही प्यार है क्या तुम इसे ही अपना प्यार कहते हो..........। 

केरोसिन उड़ेल जलती माचिस की तीली फेंककर 
अपने धड़कते दिल को तुम कैसे पाषाण बना जाते हो
भले ही झूठ-मूठ का मोह जाल था तुम्हारी ओर से मेरे लिए
दुष्टता से भरे कृत्य कर आखिर कौन सी संतुष्टि तुम पा जाते हो
क्या यही प्यार हैं क्या तुम इसे ही अपना प्यार कहते हो..........। 

स्त्री जाति स्त्री सम्मान पर खूबसूरत विवेचना कर
तुम सबके मन पर अधिकार जमाने की कुशलता रखते हो
अन्याय होने पर मुक बघिरों सा तुम चुप्पी साध लेते स्वार्थ लिए
तब क्यूं सबको समझाने की उन कलाओं को परोस नही पाते हो
क्या यही प्यार है क्या तुम इसे ही अपना प्यार कहते हो...........। 

गुस्सा लिए आंखों में किसी कुसुम पर तेजाब की बौछार कर
उसके जीवन को वीभत्स बना तुम कैसी आत्मसंतुष्टि पा जाते हो जिसके प्यार में तुम घंटों व्यर्थ करते उसके हुस्न के दीदार के लिए
उसे कुरूप बना अपने प्यार का ये कैसा घृणित स्वरूप दिखाते हो
क्या यही प्यार है क्या तुम इसे ही अपना प्यार कहते हो...........। 

नापाक इरादे लिए उसे बहला-फुसला कर
प्रलोभन दे अनेक उसकी जग हंसाई करवा जाते हो
वहशी बन सब कुछ लूट ले जाते अपनी घटिया मानसिकता लिए
हाथ नहीं डगमगाते तेरे जब उसके नर्म गले पर शिकंजा कसते हो
क्या यही प्यार है क्या तुम इसे ही अपना प्यार कहते हो...........।