मुसाफ़िर हू  मै  यारो, 
   अंजानी राहों में किस ओर चल रहा हू, 
    गिर गिर के संभल रहा हू, 
     बस चलते जा रहा हू, मुसाफ़िर हू मै यारो। 
  नगर नगर घुम के सब कुछ भूल चुका हू, 
    कौन अपना कौन पराया ये भी भूल चुका हू, 
     एक राह खत्म हूई तो दूसरी पकड़ चुका हू, 
बस चलते जा रहा हू, मुसाफ़िर हू मै यारो। 
दिन मे थका तो हवाओं का हाथ थामा, 
      रात  सितारों के संग  बिता ली, 
     घर का भी पता नहीं, ना ही मंजिल का ठौर ठिकाना, 
         ना ही दिन, रात का  पता, 
        बस चलते ही जाना , 
       बस चलते जा रहा हू, मुसाफ़िर हू मै यारो।।