रे मानव तू ना उतना उड़,
पंछी न कभी बन पायेगा...
जो दो शब्दों को प्रेम बतादे,
क्या? ता उम्र दुःख सहन कर पायेगा...
रे मानव तू.......

ना तेरे जैसा कोई छत है मेरा,
ना तेरा जैसे पहिनावा मिले...
घास-फूस की डेरा डालूँ,
उसे भी हवा कभी ले उड़े...
रे मानव तू.......

जिंदगी है तेरा...ना मुझसे लड़,
लेगा क्या जान? ता उम्रभर...
एक बूंद की ऐहसान नहीं,
तरपता छोड़...चल ले डगर...
रे मानव तू.......

दुःख की पीड़ा तू क्या जाने?
जिसे हमेशा सुख-सुविधा मिले...
मुझे देख...राही का मारा,
ना किसी ने एक बूंद पानी दिये...
रे मानव तू.......

आओ तुम-हम आपस में सद्भाव रखें,
एक-दूसरों के अब साथ चले...
मानवता की उम्र बढ़ाने को,
भूखे-प्यासे को दाना देते चलें...
रे मानव तू.......


  ✍विकास कुमार लाभ
          मधुबनी(बिहार)