फुदकती आती घर गौरैया
रूनझुन बजाती आती गौरैया
किलोल करती मधुरव मधुरव
हँसती मुस्काती चहचहाती गौरैया

बड़ी होती जाने कैसे सीख जाती
दुनियादारी ये प्यारी प्यारी गौरैया
फिर भी जाने क्यूँ दुत्कारी जाती
ये छोटी छोटी सी घर की गौरैया

इस शाखा से जाती उस शाखा
इसे सँवारती उसे भी सँवारती
फिर भी असमय बुझ जाती है
किसे कहे अपनी शाखा गौरैया

मुंडेर पर बैठी अनकहे दर्द के साथ 
विलुप्त होती जा रही हैं ये गौरैया
उड़ने को मुट्ठी भर आकाश खोजती 
टुकुर टुकुर जाने क्या तकती गौरैया

कहानी एक सी बनती जा रही है 
बेटी कहे उसे या छोटी सी गौरैया
दोनों ही बनाती घोंसला अपना कह 
फिर भी गीत अधूरे ही गाती सोनचिरैया
आरती झा(स्वरचित व मौलिक) 
दिल्ली 
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