फागुन का महीना आ गया है । मस्ती का आलम छा गया है । कान्हा वृंंदावन में होली खेलने आये हैं । गोपियाँ उन्हें रंगने के लिए तैयार खड़ी हैं हाथों में रंग, गुलाल और पिचकारी लेकर । ऐसे माहौल में वे एक गीत गा रही हैं । गीत का आनंद लीजिए । 


 उड़ै अबीर गुलाल ओ कान्हा 

उड़ै अबीर गुलाल ओ कान्हा

आज वृंंदावन में । 

कारै ते कर दऊं  लाल ओ कान्हा 

कारै ते कर दऊं लाल ओ कान्हा

आय रही है मेरे में ।।

हो उड़ै अबीर गुलाल ओ कान्हा आज वृंंदावन में  ।।


राह चलत तू ग्वालिन छेड़ै 2

माखन लूटै मटकी फोड़ै  2

ऐसो बिछावै जाल ओ कान्हा 

ऐसो बिछावै जाल ओ कान्हा

फंस जाय गुजरिया बन में ।

उड़ै अबीर गुलाल ओ कान्हा आज वृंंदावन में ।।


फागुन को या महीनो आयो 2

होरी खेलूं मन ललचायो 2

खेंचूंगी तेरे गाल ओ कान्हा 2 

मस्ती छाई बदन में ।

उड़ै अबीर गुलाल ओ कान्हा आज वृंंदावन में ।।


होठन पे मेरे आय रही गारी 2

लपट झपट में फट गई सारी 2

खुल गए सगरे बाल ओ कान्हा 2 

तेरे मेरे मिलन में ।

उड़ै अबीर गुलाल ओ कान्हा आज वृंंदावन में ।।


हरिशंकर गोयल "हरि"