"देख रही हो रति ! हमारा कृष कैसे यहां आकर सबसे घुल - मिल गया है । लगता ही नहीं है कि यह यहां नहीं रहता । हर समय दादी - दादा, चाचा - चाची और भैया की ही रट  लगाएं घूमता रहता है । हम दोनों को तो भूल ही गया है ।" 

पति विवेक के मुंह से अपने बेटे कृष  के लिए ऐसी बातें सुनकर  कुछ पल के लिए  रति यह सोचने लगी कि कृष की आंखों में ऐसी खुशी तो मैंने आज तक नहीं देखी जैसे पिछले दो  दिनों से देखती आ रही हूॅं ।

पाॅंच वर्षीय  कृष लगभग एक वर्ष बाद अपने दादाजी के घर पर आया था । उसके पिता बंगलौर में इंजीनियर थे और वह भी वहीं पर अपनी माॅं और पापा के साथ पिछले चार सालों से रह रहा था । साल में एक - दो बार ही बंगलौर से उसके पापा उसे साथ लेकर दादा द्वारा पटना शहर में बनाएं घर में लाते थे । वहां पर उसके दादा-  दादी, दो चाचा - चाची और उनके बच्चे एक साथ संयुक्त परिवार में रहते थे । 

दादाजी के घर आकर कृष को जैसे पंख लग जाते थे । दिन भर घर में धमाचौकड़ी मचाता, दादाजी के साथ घूमने निकल पड़ता और तो और दादी से कहानियां भी सुनता साथ ही दादी को  लोकगीत सुनाने के लिए भी कहता । दादी भी उसके द्वारा कही जाने वाली एक - एक बात को मानती । कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कृष यहां पर आकर उन सबके बीच रहकर बहुत खुश था । 
यूं तो कृष के दादाजी को और भी पोते - पोतियां थें लेकिन कृष की बातें, उसका नटखट और चुलबुला स्वभाव और उसकी मनमोहक मुस्कान सभी को इतनी प्रिय थी कि घर का कोई भी सदस्य यह नहीं चाहता था कि वह उनसे दूर रहें । बच्चों में सबसे छोटा होना भी उसके लिए सबके प्यार को बढ़ाने का काम करते थे । 

रति भी यहां आकर निश्चिंत हो गई थी। अब उसे बंगलौर की तरह कृष के पीछे दिन रात दौड़ना नहीं पड़ता था। रति की इच्छा थी कि वह यूपीएससी की परीक्षा में बैठे। घर के हालात कुछ ऐसे हुए कि कम उम्र में ही वह विजय की दुल्हन बनकर इस घर में आ गई थी ।

शादी के एक साल के भीतर ही कृष का जन्म भी हो गया और जब कृष नौ महीने का था तभी उसे लेकर वह बंगलौर अपने पति विजय के पास इस उम्मीद में चली गई कि वहां उसे अपने सपनों को पूरा करने का वक्त मिलेगा लेकिन यह क्या? यहां तो कृष और घर के कामों के बीच ही उसका पूरा दिन गुजर जाता और वह इतनी थक जाती कि पढ़ाई के लिए वक्त ही नहीं निकाल पाती । अब तो उसने अपने सपनों को कभी पूरा नहीं होगा सोचकर किसी से इस संबंध में बात करना ही छोड़ दिया था ।

रति की सास ज्यादा पढ़ी लिखी नही थी लेकिन वह चाहती थी कि रति आत्मनिर्भर बनें, अपने पैरों पर खड़ी हो इसलिए एक दिन उसने रति से इस संबंध में बातें की । 
पंद्रह दिन बाद विजय बंगलौर लौट गया लेकिन रति और कृष उसके साथ नहीं गए । 

कृष की उम्र अब दस साल है । रति भी अब आईपीएस ऑफिसर बन चुकी है और यह दिन उसके जीवन में सिर्फ संयुक्त परिवार में रहने वाले प्रत्येक सदस्यों की सोच और उनके साथ के कारण ही आया है । 


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                                    धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻

गुॅंजन कमल 💗💕💓