देर से ही सही,खुद को दोयम दर्जे का,
प्राणी मानने से इंकार कर रही है स्त्री l

खामोशी तोड़,समाज निर्मित,
बेतुके मूल्यों के प्रति विद्रोह कर रही है स्त्री 

पितृसत्तात्मक समाज के दोहरे मापदंडों,
पर प्रश्नचिन्ह लगा रही है स्त्री

अपने अस्तित्व,अपनी अस्मिता के प्रति
 निरंतर सचेत हो रही है स्त्री

रूढ़िग्रस्त, हीन छवि छोड़ते हुए,
 नई पहचान बनाती जा रही है स्त्री

 शिक्षित हो समस्त जाति के लिए,
 उन्नति के द्वार खोल रही है स्त्री

 समाज में रहकर अपनी कामयाबी से,
 निरंतर समाज के लोगों की सोच बदल रही है स्त्री l

केवल स्त्री दिवस को नहीं बल्कि हर क्षण को अपना मान,
नित अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर समाज का मान बढ़ा रही है स्त्री 


 स्वरचित एवं मौलिक
सुनीता कुमारी अहरी