बढ़ती मंहगाई ने कमर को तोड़ दिया।
गरीब की थाली को खाली ही छोड़ा।

आसमान छूते पेट्रोल के दामों को बढ़ाया।
जरूरत की चीजों ने महंगाई से नाता जोड़ा।

आटा, दालें,चावल,चीनी के भावों को बढ़ाया।
सब्जियों ने भी तैश में आ थाली से मुँह मोड़ा ।

देशी घी खाने की बजाय सूंघने से काम चलाया।
तेल ,तिलहन की बढ़ी कीमतें सुरसा सा मुँह खोला।

पीछे कहाँ रसोई सिलेंडर भाव फिर उसने भी खाया।
दूध वाले भैया ने महंगाई का रोना रो दूध में पानी छोड़ा।

लड़ाई ,झगड़े,युद्ध ने आम आदमी को है पगलाया।
हाय सभी ने जीने लायक आम आदमी को नहीं छोड़ा।

मौलिक