हर वक्त हर चाह को मंहगाई मार गई। 
जीवन की हर ज़रूरत पर मंहगाई का चाबुक यूँ पड़ा, 
जैसे हाँथों को पत्थर की तुड़ाई मार गई। 
जीभ की क्या कहें स्वाद की बेहयाई मार गई। 
आँतों को तो पेट की भूखी मार गई। 
मनोरंजन को फुर्सत नहीं  विद्युत की जुदाई मार गई। 
मैदा चावल चीनी खोया, चढ़ रहे आसमान, 
यहाँ तो भाइयों पकवानों की पकाई मार गई। 
होटल  सिनेमा भूल गए सब, बस टीवी में सिर खपाई मार गई। 
डिजिटल युग का क्या करें!  
नेटवर्क समस्या की गति ही मार गई। 
बीमारियों का क्या करोगे, बदलते डॉक्टरों की फीस और दवाई मार गई। 
बच्चों की शिक्षा का क्या करें, शिक्षण-संस्थानों की ढूंढकर मार गई। 
जिन्दगी को तो हर बाज़ार की स्टाइल मार गई। 
शहरीकरण क्या हुआ, फ्लैटों की रहनुमाई मार गई। 
ई एम आई के विज्ञापन से सजा घर को तो किश्तों की भरपाई मार गई। 
जीना हो रहा दूभर, मीडिया की के टी आर पी बढ़ाने की चाहत मार गई। 
रोना बंद करो मंहगाई का,
आवश्यकताएँ समेटो, संयोजन करो परिस्थितियों से ,हर हाल में खुश रहो, आगे बढ़ो करो अगुवाई। 
हिम्मत इतनी रखो मार सके न कोई मंहगाई। 
दम भरो ऐसा कि सबको नेक राह चला सको,
दुःखियों के अधरों की मुस्कान बन सको।
रचनाकार-
        सुषमा श्रीवास्तव 
उत्तराखंड।