उस बचपन को धन्यवाद है, मैं उसका आभारी।
50-60 का दशक जो था, मैं उसका आभारी।

नहीं लौट के आयेगा दुबारा,उसका मैं आभारी।
दिया खुशी जो बचपन में,उसका हूँ मैं आभारी।

याद रुआफजा का पीना,और एनर्जी लेना भी।
याद है नींबू चीनी पानी के,शर्बत का लेना भी।

गुड़ खाकर पानी पीना,तुरन्त एनर्जी पाना भी।
रक्तस्त्राव में फिटकरी दूध,से बंद हो जाना भी।

वाशिंग मशीन से नहीं,हाथों से कपड़े धोना भी।
दीवारों में लगते देखा है,मैंने बहुत से लोना भी।

कपड़ों में नील टिनोपाल,की ये सफेदी देना भी।
घर की कच्ची दीवारों को,मिट्टी गोबरी देना भी।

दरवाजे के दुवार पर ये झाड़ू,रोज सुबह लगाना।
सरिया से गौ के गोबर पलरी,सुबह शाम हटाना।

लालटेन चिमनी में पढ़ना,ढिबरी दिया जलाना।
दीवट ताख दिया रखना,वोसारे में भी जलाना।

मिट्टी का तेल चिमनी एवं,ढ़िबरी में डलवाते थे।
शाम से पहले लालटेन का,शीशे ये चमकाते थे।

शाम हुई तो निज बिछौना,कैसे रोज लगाते थे।
सुबह भोर में रोज बिछौना,कैसे रोज हटाते थे।

बिस्तर से उठने के पहले,प्रभु सुमिरन ये होता।
बड़ों का पैर छू कर उनका,आशीष लेना होता।

तुरंत बाद हाथों में होता था, पानी का ये लोटा।
फारिग होने को जाते थे,बस बैठें खोल लंगोटा।

हाथ एवं लोटे को मिट्टी व,राख से चमकाते थे।
नीम बबूल की दातूनों से,दाँतों को चमकाते थे।

दुवार मोहार चबूतरा सब,झाड़ू से चमकाते थे।
खेत एवं खलिहानों में भी,तो काम करवाते थे।

कुछ एक्सरसाइज वर्जिश, एवं कुछ दंड भांजते।
बाबा दादी बुआ चाचा माँ जो,कहते उसे मानते।

फूल तोड़ते थे पूजा हेतु, पूजन का बर्तन मांजते।
तोड़ा सरसो के तेल से भी,हम शरीर को मांजते।

रस्सी बाल्टी लेकर फिर, कुएं से पानी भरते थे।
ठंड में गर्म गर्मी में ठंडा,पानी से स्नान करते थे।

पूजा घर किंवाड़ खोला,प्रभु की पूजा करते थे।
चंदन घिसते धूप दीप दे,चालीसा पढ़ा करते थे।

पूजा पाठ से निवृत्त हो,यह नाश्ता हम थे करते।
स्कूल का मिला काम सब,पूरा उसको थे करते।

बस्ता अपना स्कूल हेतु ये,लगा कर फिट करते।
खाना खाते टिफिन रखते,कपड़े पहना ये करते।

पैदल या साईकल पोछ,स्कूल थे निकला करते।
स्कूल पहुँच हाजिरी देते,प्रार्थना पीटी भी करते।

कक्षा में सहपाठी संग,गुरुओं से हर विषय पढ़ते।
इंटरवल में टिफिन करे, कुछ खेल कूद भी करते।

शाम को घर आने पर माँ,कुछ न कुछ खिलाती।
बप्पा काम से लौटें तो,घर रौनक थी बढ़ जाती।

दशहरा एवं दिवाली में,मिठाई जलेबी थी आती।
नई फसल तैयार हुई जब,नेवान पूजा की जाती।

गाँव के संगी साथी के संग,भी हम खेला करते।
थोड़ी देर नीम पीपल के,चबूतरे पर बैठा करते।

थक जाने पर कुछ देर,सभी सुस्ताया थे करते।
खेत एवं खलिहानों में,दंवरी व मड़ाई थे करते।

गर्मी छुट्टी में तिवरा कौड़ी,ये गुटटी भी खेला है।
झाबर चिल्होर आइस पाइस,ये भी तो खेला है।

कंचा गोली गुल्ली डंडा, चिब्भी भी हमने खेला।
रस्सी कूद लुका छिपी,ये खेल भी खूब है खेला।

बंदर डमरू एवं मदारी का,गाँव में खेल देखा है।
दुलदुल घोड़े की नाच एवं,धोबी नाच ये देखा है।

कुर्मी अहिर के नाच देखे,मोर भी नाचते देखा है।
कठपुतली का खेल देखे,रस्सी पे नाचते देखा है।

स्कूलों में गुरु के सामने,पुस्तक ये वांचते देखा है।
पंडित जी को सत्यनारायण,कथा वांचते देखा है।

बुलबुल तोते बिल्ली कुत्ता,घरों में पालते देखा है।
बत्तख कबूतर मोर भी हां, घरों में पालते देखा है।

दो बैलों की जोड़ी से खेतों,में हल चलते देखा है।
बैलगाड़ी से सामान ढोते थे,बचपन में ये देखा है।

दो बैलों की जोड़ी से कुँए,पानी पुरवाही देखा है।
मोट से पानी कुँए से खींचे, चले पुरवाही देखा है।

बैलों की जोड़ी से ही मैंने,अन्न की मड़ाई देखा है।
बैलों से कोल्हू चलते थे,सरसो तेल पेराई देखा है।

नानी जो कढ़ी मीठा पना-बरा, बनाया खिलाया है।
मुंगौरी रसाज खरिका व,चूनी की रोटी खिलाया है।

गुड़ सौंफ आम नमक से,बना गुड़म्मा खिलाया है।
मिट्टी की छत पर उगे भुइंफोर,बनाया खिलाया है।

आम के मौसम में दादी,अमावट बना खिलाया है।
देशी घी-आटे का हलवा, खूब बनाया खिलाया है।

चूल्हे की सोंधी रोटी भी,अम्मा ने सेंक खिलाया है।
मटकी की जमाई साढ़ी दार,दही खूब खिलाया है।

महुआ का लाटा परमल,राब पितूरा तिल्ली खाया।
दूध तिल महुआ उबला, लप्सी गुलगुला भी खाया।

सनई फूल की सब्जी,अगस्त फूल के पकौड़े खाया।
जंगल जलेबी लसोड़ा ढेरा,पोई पत्ता पकौड़े खाया।

लाल काली मीठी झमकोइया,खेत में पेटुआ खाया।
अलसी बर्रे खिन्नी मौलश्री,खूब देशी आम है खाया।

अपने खेतों से चने का साग,मटर का पुल्ला खाया।
अरहर और मटर की छीमी,खूब तोड़ा और खाया।

रसियाव जर्दा मीठाचावल,बबरा गुड़धनिया खाया।
जोंधरी बजड़ी मोथा पेटुआ,गेहूँ चबैना चबा खाया।

नौटंकी सर्कस गंवई मेला,श्रीकृष्ण रामलीला देखा।
नरकुल सेण्ठा निबकलम,तख्ती से पढ़े लिखे देखा।

विविधभारती रेडियो न्यूज़ सुने,दूरदर्शन टीवी देखा।
बीबीसी लंदन न्यूज़,बिनाका गीत माला सुना देखा।

पहलवानों के कुश्ती दंगल, हरे भरे खेतों को देखा। 
सरपत के बल्ले से बुना, बेना भौंकी दौरी भी देखा।

अम्मा बुआ चाची दादी,की बल्ले में सरफुन्दी देखा।
नानी दादी अम्मा चाची,को सिकहुला बुनते है देखा।

कांड़ी में कूटते चकरी से दरते,जाँत से पिसाई देखा।
दादीनानी को फूल के थाली पे,आँजन घिसाई देखा।

नहीं भूलता है वो बचपन,मैंने जिस दौर बिताया है।
अभी और भी कितनी यादें हैं,कुछ ना बिसराया है।

उस बचपन को धन्यवाद है मेरा,मैं उसका आभारी।
50-60 का दशक जो था,मैं उसका सदा आभारी।



रचयिता :
डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पीबी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.