ये मालिक तूम क्यों भेजे हो,
तन का भी सेवा ना कर पाऊं...
रात्रि मोम से 'लौ' जली है,
ना नींद कभी पूरी कर पाऊं...

सब कहता है सत् कर्म करो,
पर सत् कर्म को ना मैं समझ पाऊं...
भिक्षा से भयभीत लगे,
फिर कैसे मैं भिक्षुक बन पाऊं...

ना उम्र सदा कभी एक रहे,
ना कर्तव्य पथ कभी मैं चल पाऊं..
साधूओं की जन सेवा में,
अपना कर्तव्य निभाता जाऊं...

हे इश्वर मेरा राह बतादे,
किस पथ पर मैं चलने आया हूँ...
कब तक मैं इस जग का सेवक,
कुछ समय के लिए रहने आया हूँ...

ना यहाँ मेरा अपना है,
सब तेरा ही तेरा कहता है...
फिर मेरा कौन कहो मालिक,
किसके साथ मैं रहने आया हूँ...

इस जग का कोई मोह नहीं,
जहाँ देखता हूँ केवल विष ही विष है...
डर कर जिने से मौत भला,
मैं तो अमृत जल पीने आया हूँ...

बस पुरातत्व की समाधि पर कौन ले जाऐगा,
अग्नि की आहुत कौन दे जाऐगा...
ना कोई मेरा सा एक कहे,
इसी डर से शरीर कँपकपा जाऐगा...

फिर ना सुख ना दुःख की चिंता,
ऐसा भाव कहाँ पाऊँगा...
नश्वर की परलोक सिधारुँ,
जहाँ सदा पूजे जाऊँगा...

बस एक सदा तेरी आश लगे प्रभू,
कर कृपा इतना भर तू...
मेरा भी सदा मान रहे,
फिर ना तन का कोई रोग लगे...


✍️विकास कुमार लाभ
        मधुबनी(बिहार)