मां कौन कहता तुम नहीं हो,
तुम हो यहीं हो मेरे मन में, ईस जीवन में 
फूलों की खुशबू की तरह शामिल हो।
दिन के उजाले की तरह नित्य हो!
सारंग बन मन को शीतल करती।

एकांत के शोर में!
मौन के प्रबोध में!
आत्मा की तल्लीनता में, 
बस दूर हो गई हो
 समय के कालचक्र में।
 
पर तुम हो!
मेरे अंतर्मन में !
मेरे मनोल्लास में !
मेरी अनुकृतियों में तुम ही तो हो।

कोई कहता तुम  अब नहीं हो...
पर मैं जानती हूं 
मेरे खाने के स्वाद में, 
परिधान के चटख रंग के चुनाव में, 
किसी अन्य के परवाह में,
आशीर्वचनों के बोल में 
मेरे आवाज की माधुर्य में , 
जीवन के स्वीकार्य में, 
तुम ही तो हो।

मां तुम हो यहीं मेरे अंतर्मन  में, 
मेरे विश्वास में, मेरे जीवन की प्रेरणा में ,
तुम ही तो हो!
कैसे मान लूं कि तुम अब नहीं..

                             " पाम "