जब हम मिले नहीं थे पहले,
कभी हुई नहीं थी कोई बात।

पहली नजर में देखा था मैंने,
तुम अच्छी हो दिल है साफ।

जब से मिले हैं किसी बहाने,
कभी-2 ये होती ही थी बात।

भले साल भर करूँ प्रतीक्षा,
पंद्रह दिन तो होती थी बात।

ऐसे कोई साल नहीं है बीता,
जब कभी-2 न हुई हो बात।

एक साल ऐसा भी तो बीता,
किसी से कोई  हुई ना बात।

पंद्रह दिन भी नहीं रहा अब,
दस दिन ही हो सकती बात।

एक है कर्म धर्म व जिम्मेदारी,
करना है केवल एक ही बात।

प्रथम दायित्व निर्वहन जरूरी,
करते रह सकते कभी हैं बात।

मुझे बहुत ही अच्छा लगता है,
जब तुम करते हो मुझसे बात।

तुम्हें ना दिखला बतला सकता,
दिल में है तुम्हारे लिए जो बात।

मेरे लिए तो खुशी यह है केवल,
अब तो  होगी फिर हफ़्तों बात। 

रोज मिलेंगे मिलकर काम करेंगे,
बीच-2 में दोनों करते रहेंगे बात।

रिश्तों का कोई  मोल नहीं होता,
दिल की पसंदगी की होती बात।

जब ये रिश्ता नापाक नहीं होता,
तो कोई हर्ज नहीं करने में बात।

रिश्तों को लंबा बनाये रखना है,
तो होती रहनी चाहिए ही बात।

कभी कभी बातें ये करते रहना,
हालचाल मिलती करने से बात।

नजरों के सामने रहें नहीं जरूरी,
एक दूसरे का ये समझे जज़्बात।

इसीलिए तो मैं अक्सर कहता हूँ,
होती रहे आपस में हमारी बात।

कब तक कौन रहेगा ? दुनिया में,
कहाँ पता है किसी को यह बात।

इस लिए इंज्वाय करो जीवन में,
समय समय की ही है सब बात।



रचयिता :
डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पीबी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.