जल रही हैं रातें मेरी
सुलग रही है सांँसे मेरी
 तुमसे पल भर की ये दूरी 
कटती नहीं लगे बरसों सी
तपती रेत सी तेरी जुदाई 
तू जुल्मी तू बड़ा हरजाई
देहरी पर बैठी टकटकी लगाए
हर आहट पर लगे तुम आए
जब से पिया तुम परदेश गए
ना भूख रही ना प्यास लगे
तेरे विरह में ऐसी अगन लगी 
जलती दोपहरी सी जले जिंदगी
तेरी याद में हुई मैं बावरिया 
अब तो लौट के आजा सांवरिया
घर सूना तुझ बिन सूना अंगना
चुप है घुंघरू कुछ ना बोले कंगना
आ तो सही करनी है तुझसे ढेरों बातें
कैसे कटे दिन कैसे कटी मेरी रातें 

नेहा धामा " विजेता " बागपत , उत्तर प्रदेश