वक्त के पहिए पर है ये ज़िन्दगी 
दौड़ती भागती सी ये ज़िन्दगी ,
थकी-थकी सी किंतु बेपरवाह अबाध बढ़ी जा रही।
बेखटके क्षितिज के पार जाने को है विकल,
काल को भी धकेल कभी थमी- थमी सी ज़िन्दगी, 
अनकहे बोझिल बोझ को ढोती हुई,
जाने क्यूँ कभी दबी-दबी सी है ज़िन्दगी। 
अंतर ध्वनि को महसूस करती हुई खुद से ही करती जंग।
अपने आप से ही लड़े जा रही है ये ज़िन्दगी। 
जाने कब से पता ही न चला स्वयं को  
न भूख न प्यास बाकी है न कोई ख्वाब, 
फिर भी उलझी सुलझी सी डोर को थामें,
भोर की लाली में चल देने को तैयार, 
कभी तो सकूँ के पल निकाल लो जीने के,
कभी तो मुस्कराहटों का आदान
प्रदान कर लो, 
जिसने धरा पर भेजा उसके भी काम कर लो,
कर्म यज्ञ करते-करते उसका भी नाम ले लो।
आजीवन कल को भागे अब आज को तो जी लो।
जीवन में भागना नहीं, कुछ पल ठहर कर देखो,
आज का रसानन्द आज लेकर तो देखो,
भागते-दौड़ते नहीं चलते-चलते जीकर देखो,
इस ज़िन्दगी के प्रयोग को जिन्दादिली से जीना,
खुद खुलकर हँसना और सबको है हँसाना ,
जीवन के भाग-दौड़ को रस ले लेकर है जीना।
यही तो है आज के भागदौड़ की ज़िन्दगी,
मस्त खिलखिलाहटों से कर लो ज़िन्दगी। 
  रचनाकार- सुषमा श्रीवास्तव 
मौलिक रचना, सर्वाधिकार  सुरक्षित,रुद्रपुर, उत्तराखंड।