नजर न लड़ती ,क्या करूँ, 
रात न कटती, क्या करूँ,

जुदा होकर तुम्हीं बताओ,
किसकी चलती,क्या करूँ,

 नज़्म , शेर और गज़लें मेरी,
तुम पर खुलती, क्या करूँ,

महक तेरी अब तन से मेरे,
नहीं निकलती ,क्या करूँ,

सावन जब आये आंगन में
विरह मचलती ,क्या करूँ,

याद तुम्हारी पड़ी है पीछे,
टाले ना टलती, क्या करूँ,

राह देखता सुबह और शाम,
तुम नहीं टहलती क्या करूँ,

तुम बिन हिम की ठंडक भी ,
आग सी जलती, क्या करूँ,

नाम पुकारे शब भर "कौशल"
पर वो न मिलती,क्या करूँ ।।
        कवि कौशल गोंडवी