यदि सारे विश्व की सारी शक्तियां एकत्रित हो जायें तब भी वे ब्रह्मतेज की शक्ति के समक्ष कम ही रहेंगीं। भला विभिन्न सांसारिक शक्तियां किसी एक भी ब्रह्म ज्ञानी को किस प्रकार परास्त कर सकती हैं।

   जिस प्रकार महर्षि वशिष्ठ के समक्ष क्षत्रिय नरेश विश्वामित्र के सारे प्रयास व्यर्थ रहे थे। उनके सैनिक तो धेनु नंदिनी की श्वासों से जन्मे वीर सैनिकों को देख ही भाग खड़े हुए थे, ठीक उसी प्रकार महाराज अलर्क की सेना तीन तपस्वियों के सामने असहाय थी। तपस्वियों की तरफ देख कर लक्ष्य करना संभव नहीं हो रहा था। सत्य था या भयाधिक्य में जन्मा भ्रम कि सैनिकों को तीन तपस्वी असंख्य रूप रखे दिखाई दे रहे थे। हालांकि तपस्वियों ने सैनिकों पर किसी भी अस्त्र या शस्त्र से प्रहार नहीं किया। वे केवल सैनिकों का प्रतिकार कर रहे थे। पर महाराज अलर्क की चतुरंगिनी सेना जिसकी शक्ति का अलर्क को कुछ अहंकार भी था, तपस्वियों का समर्पण करा पाने में पूर्णतः असहाय रही। दसों वीर राजकुमार भी तपस्वियों के तेज के समक्ष असहाय सिद्ध हुए और अंत में तो महाराज अलर्क भी अपने भाइयों के सामने असहाय बने रहे। महाराज अलर्क की अपने तीन तपस्वी भाइयों से पराजय यह स्वीकार करने का आधार बन चुकी थी कि अब राज्य पर संकट की छाया पड़ चुकी है। विभिन्न विद्वानों, रणनीतिकारों से मंत्रणा होती रहीं। उन मंत्रणाओं के निर्णयों पर किये गये महाराज अलर्क से सारे प्रयास असफलताओं की सूची में अपना नाम लिखवाते रहे। विपत्ति से पार पाने का कोई भी उपाय दिखाई नहीं दे रहा था। 

   सचमुच ऐसी विपत्ति जीवन में कभी कभी आती है। यदि आज माता जी का साथ होता तो निश्चित ही उनकी राय इस विपत्ति का भी अंत कर देती। दुखद है कि आपदा के इस क्षण में आज माता जी का भी सहारा नहीं है। 

   अलर्क को माता मदालसा का स्मरण आया। फिर ध्यान आया माता जी का वह पत्र। माता जी ने क्या कहा था। यदि किसी विपत्ति से पार न पाओ तो इस पत्र को पढना। सचमुच ऐसी विपत्ति की कल्पना भी नहीं की थी। अब माता जी का पत्र ही मुझे राह दिखायेगा। 

   एक संदूक में महारानी मदालसा का पत्र सुरक्षित रखा गया था। महाराज अलर्क ने वह संदूक खुलबाया। माता का पत्र उठाया और उसे खोलकर पूरा पढा। कुछ समझ नहीं आया। आखिर जिस लोरी को महारानी मदालसा अपने तीन पुत्रों को सुनाती थीं, उस लोरी का आशय इतना आसान भी नहीं था कि उसे एकदम समझा जा सके। मनीषियों की सभा में कोई भी मनीषी महारानी मदालसा के पत्र का आशय सही तरह समझ नहीं पाया। 

  " यह क्या रहस्य है। माता जी ने मुझे बचपन में ही राजधर्म की शिक्षा दी। जिस समय मेरा राज्याभिषेक हो रहा था, मुझे यह गुप्त पत्र दिया। विपत्ति के समय ही इस पत्र को पढने का आदेश दिया था। आज ऐसा क्षण है जबकि मैं अपने पूर्ण प्रयासों के बाद भी राज्य पर आयी विपत्ति का निवारण नहीं कर पा रहा हूं, माता जी का पत्र ही निश्चित मुझे मेरा कर्तव्य समझा सकता है। पर इस गुह्य पत्र का आशय मैं तो क्या, बड़े से बड़ा विद्वान भी नहीं समझा पा रहा है। 

  माता जी। जिस तरह आपने भविष्य की विपत्ति के विषय में अनुमान लगा लिया था, उसी तरह मैं अनुमान लगा सकता हूं कि इस पत्र का आशय समझाने के लिये भी आपने कुछ तो प्रबंध कर रखा होगा। माता जी। इस विपदा की घड़ी में केवल आप ही हम सभी का सहारा है। मुझे राह दिखाइये। "

   जब महाराज अलर्क विद्वानों की सभा में माता मदालसा से प्रार्थना कर रहे थे, उसी समय एक वृद्धा उस सभा की तरफ बढ रही थी। वह वृद्धा न तो राजपरिवार की सदस्या थी और न ही वर्तमान में राजमहल में कार्यरत। फिर भी वह बिना अवरोध के आगे बढ रही थी। आखिर जिसका सम्मान खुद महाराज अलर्क करते हों, उसे महाराज के पास जाने से कौन रोक सकता था। 

  वृद्धा ने सभा में प्रवेश किया तो महाराज खुद अपने आसन से खड़े हो गये। अपनी माता मदालसा से प्राप्त संस्कारों के अनुसार उन्होंने धाय माॅ को प्रणाम किया। 

   " प्रणाम धाय माॅ। घर पर सब कुशल हैं। आप संदेश भेज देतीं तो मैं खुद ही आपके पास आ जाता।" 

  "महाराज। सच्ची बात तो यही है कि आज मेरा मन आपसे मिलने को बहुत व्यग्र हो रहा था। बार बार लग रहा था कि महारानी मुझे आपको मिलने के लिये निर्देशित कर रही हैं। मैं मात्र एक दासी, परम विदुषी महारानी की बातों का अर्थ क्या समझूं फिर भी लग रहा है कि महारानी कह रही हैं कि उस पत्र को समझने की राह मैं बता सकती हूं। "

  जिस पत्र का आशय कोई नहीं बता सका, महाराज अलर्क ने वह पत्र धाय को सुना दिया। वृद्धा आशय क्या समझी। फिर भी समझ गयी कि यह तो वह लोरी है जिसे महारानी तीनों बड़े राजकुमारों को सुनाती थीं। 

 " महाराज। महारानी मदालसा परम विदुषी थीं। उन्होंने अपने पत्र में जिस लोरी को लिखा है, उसका आशय वे ही जानते हैं जिन्होंने बचपन में उस लोरी को सुना है। समूचे विश्व में केवल आपके तीनों भाई भी इस पत्र का आशय समझते हैं।" 

   मनीषियों का निश्चय स्पष्ट था। समस्या थी कि माता मदालसा के पत्र का आशय तीनों भाई जानते हैं और भाई इस समय शत्रु हैं। फिर इस पत्र का आशय कैसे ज्ञात होगा। 

  " महाराज। कह सकती हूं कि महारानी से दुर्लभ ज्ञान प्राप्त करने बाले तीनों बड़े राजकुमार पूरे विश्व में किसी के भी शत्रु तो नहीं बन सकते। सचमुच बड़ा रहस्य है।" 

  वृद्धा अपना मत व्यक्त कर चली गयी। और अलर्क भी चल दिये। चल दिये माता मदालसा के पत्र का आशय समझने के लिये। राजनीति के ज्ञाता को पूर्ण विश्वास न था कि भाई शत्रु नहीं हैं। फिर भी राजनीति का ज्ञाता जानता था कि प्रजा की विपत्ति दूर करने के लिये यदि राजा को अपने प्राण भी त्यागने पड़े तो भी पीछे नहीं हटना चाहिये। 

   " भाइयों। मैं आ गया। अकेला और अस्त्रहीन। मुझे कोई भय नहीं यदि आप मेरा वध भी कर दें। पर माता जी का पत्र जिसका आशय केवल आप ही जानते हैं, वह समझा दो।" 

  "हाॅ ।क्यों नहीं। आखिर उसी के लिये तो हम आये हैं। आखिर माता जी की आज्ञा भी तो यही थी। सचमुच यह युद्ध मात्र एक नाटक है। यथार्थ तो है माता जी की आज्ञा का पालन। माता जी की इच्छा का अनुसरण। और वह मात्र यही है कि तुम हमारे छोटे भाई इस सच्चे ज्ञान से बंचित न रहो जिसे जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रहता। "

  माता मदालसा की लोरी की व्याख्या समझाते समझाते कई दिन बीत गये। जिस लोरी को सुन तीन राजकुमार बचपन से ही परम वैरागी बन गये, वह ज्ञान इतना गहन था कि उसे समझने और आत्मसात करने में अलर्क को बहुत दिन लग गये। पूरे जीवन राजधर्म का पालन कर वह भी वैराग्य पथ के राही बन गये। 

  एक बार फिर से राज्याभिषेक का आयोजन हुआ। महाराज अलर्क ने बड़े पुत्र को राजगद्दी सोंप उसे राजधर्म की शिक्षा दी। छोटे बेटों को संगठित रहने की शिक्षा दी। फिर अलर्क भी अपने भाइयों के साथ वैराग्य के अनंत पथ पर निकल गये। जिस पथ पर गया हुआ कभी वापस नहीं आता है। आवागमन से चक्र से मुक्त हो जाता है। जिस तरह देवर्षि नारद से ज्ञान पा प्रजापति दक्ष के पुत्र वैराग्य पथ के राही बन कभी वापस नहीं आये, उसी तरह चारों भाई विक्रांत, सुबाहु, शत्रुमर्दन और अलर्क कहाॅ गये, कभी ज्ञात नहीं हुआ। 

समाप्त 
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'