तेरे पास आते - आते दूरियां और भी बढ़ गई ।।
मुक्दर थी बातें तेरे साथ अंत सांस तक जीने की
तेरा वह वादें भी न जाने कहां विखर सी गई।।
जीवन की कड़ियां जुड़ ही रहे थे तुमसे भी
फिर पता नहीं कब जिंदगी भी बिफर सी गई ।।
तेरी आदत ऐसी लगी है इस मतलबी दिल को।
बिना तेरे साथ के जैसे यह भी ठहर सी गई।।
अब तू किस बात की ले रही है परीक्षा मेरी।
यह उलझी जीवन भी तेरे आने से सुधर सी गई ।।
छोड़ कर रुसवाइयों को आजा तू मेरे साथ जीने ।
तेरे बिना जिंदगी टूटी मोतीयों सी बिखर गई ।।
तेरे बिना ही मैं चल रहा हूं अकेला पथ नगर पर ।
अब साथ बिना तेरे जीवन की शाम भी निकल गई ।।
अब एक पल भी काटना हो रहा है तेरे बिना मुश्किल।
तेरे जाने से जैसे कुछ हलचल सी अंदर ही चल गई ।।
बहुत हुआ तेरा रूठना मुझसे अब आ भी जा।
तेरे साथ बिना यह जीवन की कहीं ठहर सी गई।।
तू है मेरे हृदय की अनमोल सम्राज्ञी कोमल सी।
तू ही इस दिल में राज मनोहर सी कर गई।।
मित्र

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