नारी तू शक्ति है नारी तू सम्मान है
नारी तू ही सृष्टि है तुझसे ही दूनियां जहान है
तेरी ही ममता की छाया में पलता इंसान हैं
फिर तेरी साथ ही क्यो होती रहती हैं हिंसा
क्या तेरी इतनी सस्ती सी जान है
तू ही उपवन तू ही बगिए की शान है
तो हे नारी रोज तेरा क्यो होता अपमान है
तुझसे नदियां तुझसे धर्म तुझसे ही इंसान हैं
तेरी ही अमृत से सींचा जाता यह ज़हान है
फिर तू क्यो जलती तड़पती सरेआम है
क्यो कर देती नहीं भस्म उन्हे उसी क्षण
जो समझते तुझे बस एक समान है
क्यो मिटा नहीं देती वजूद ही उनका
जो मनुष्य के वेश में घूमते शैतान है
तू भूल गई शायद तू ही दूर्गा तू ही काली
तू ही चंडिका तूने ही संघार किया कितने हैवान है
तुझसे ही है अस्तित्व सदैव धरा की
तेरे ही रक्तो से ही सींचा यह इंसान हैं
तू ही सृष्टि कारणी है तुझमें ही भगवान है
तेरे चरणों में मेरा शत् शत् प्रणाम है

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