युवा नेता चुन्नू तिवारी हमारे पड़ोसी हैं, और अपने कॉलेज में पक्के नेता वाली छवि रखते हैं,
नेता बनने के चक्कर में बहुत कुछ खोया बहुत बार कुटाएं, पिटाएं और हौंकाएं हैं। चुन्नू तिवारी को बहुत सी किरांती में भी भाग लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है और जिसमें भी भाग लिये हैं, समय देख कर भाग लिये हैं।... एक बार तो दिल्ली के लाल किले पर किरांती करने गएं पर राजधानी से अपनी ही किरांती लाल करा आएं... पहले हमारे चुन्नू ऐसे न थें... इन्हीं से जुड़ा एक किस्सा सुना रहे हैं... की कैसे हमारे गांव का चुन्नुआ युवा नेता चुन्नू तिवारी बना... और उसी के चक्कर में एक बहुत बड़ा बलिदान भी देना पड़ा ।
ये उन दिनों की बात है, जब चुन्नू गोड्डा कॉलेज से ग्रेजुएशन कर रहे थें(यहां विषय बताना ज़रूरी नहीं समझता मैं क्यूंकि ये मुद्दा भटक जाएगा)। उस समय अचानक से उनपर छात्रसंघ चुनाव लड़ने का भूत सवार हुआ, अब उनपर ये भूत किसी राजनेता के घर के पीपल से लटका या किसी सहपाठी तांत्रिक ने थोपा ये कहना कठिन था, पर भूत ऐसा चढ़ा था कि बड़ा से बड़ा राजनीति से पीड़ित पंडित-ओझा उसे न भगा सका... इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा।
चुनाव का समय निकट आया और चुनाव की तैयारियों में चुन्नू तिवारी को पहली सीख मिली कि रंग रूप देख कर ही भीख मिलती है... तो चुन्नू ने सबसे पहले अपना रूप रंग बदला। पैंट-शर्ट पहनने वाले चुन्नू ने युवा नेता स्टार्टर पैक के रूप में कुर्ता, पायजामा, सदरी, गमछा और दबंग वाले चश्में को सब्सक्राइब किया। यातायात व्यवस्था के लिए अपने पड़ोसी फुलसगरा से उसकी फटफटिया उधार ले आएं क्यूंकि बुलेट का बजेट नहीं था, फुलसगरा चुन्नू का लंगोटिया यार है तो इतना तो कर ही सकता है न।
चुन्नू में ऐसा परिवर्तन देख बाबूजी चकित रह गएं,
साप्ताहिक स्नान करने वाला लड़का तड़के ही स्नान ध्यान करने लगा... माथे पर तिलक-चंदन और गले में रुद्राक्ष कब से धारण करने लगा...?
पड़ोसी और मोहल्ले के मित्र भी अचंभित हो गएं...
इस चुनाव के भूत ने चुन्नू की रंगत बदल दी...
बस बाकी था नेताओं वाले दांव पेंच सीखना तो वो भी सीख ही रहे थें।
अब चुन्नू तिवारी अपने समर्थकों या कहें कि चेलों चपाटों के साथ चलें पर्चा भरने और अपने खर्चे से पर्चा दाखिल किया... और फिर कॉलेज में इनकी भी चर्चा होने लगी... की चुन्नू तिवारी भी छात्रसंघ अध्यक्ष पद से चुनाव लडेंगे... क्यूंकि अपने जीवन का पहला चुनावी पर्चा भर रहें थें तो खर्चा भी किएं... और अपने समर्थकों को समोसा जिलेबी खिलाएं...।
धीरे-धीरे चुन्नू को कॉलेज में युवा नेता के रूप में लोग जानने लगें... अब चुन्नू, चुन्नू तिवारी से युवानेता चुन्नू भइया हो गएं... पर युवा नेताओं को एक दिक्कत होती है बहुत बड़ी वाली...
अब लड़कें भैया बोलें वो चलता है, पर अब चुन्नू को लड़कियां भी चुन्नू भैया बोलने लगीं थीं...
उसी कॉलेज की छात्रा रिंकी दूबे, चुन्नू के दिल जिगर गुर्दे का करार थी... पर कहें तो एक तरफा वाला प्यार थी। जब भी चुन्नू रिंकिया को अपने सामने देखते, तो उनके दिल से बस यही आवाज़ आती कि ईहे हमरी मेहरिया बनेगी...। पर सामने कुछ कह नहीं पाते थें घिग्घी बंध जाती थी उनकी।
मन ही मन ब्रह्मबाबा, डीहबाबा, योगिनी माई, चिहारी माई सबको एक साथ याद करते, मनौती मांगते, करजोरी करते कि हे प्रभु! कौनो चक्कर चलाइये आ रिंकिया के मन में हमरे खातिर प्रेम का फूल खिलाइये...
पर शायद भगवान जी चुन्नू के साथ खेल खेल गएं।
एक दिन उसी चुनावी माहौल में कॉलेज ग्राउंड पर चुन्नू अपने चेलों के साथ चर्चा कर रहे थें कि तभी चुन्नू का दिल जिगर गुर्दा सब छिला गया, जब पीछे से चिर परिचित आवाज़ आई -
प्रणाम चुन्नू भैया! कैसे हैं...? और ये आवाज़ थी रिंकिया की... चूंकि सारा कॉलेज चुन्नू तिवारी को चुन्नू भैया बोलने लगा था तो रिंकिया भी अब चुन्नू को भैया बोलने लगी... इससे पहले रिंकिया ने चुन्नू को कभी चुन्नू भैया नहीं बोला था...। और इस दुर्घटना का प्रमुख कारण था चुन्नू का चुनावी भूत... और ये चुनावी भूत किसी ना किसी की बलि तो लेगा ही... तो उसने चुन्नू के पहले, इकलौते और एकतरफा प्रेम की बलि ले ली । उतने लोगों के सामने चुन्नू भैया अपनी क्रस के भी भैया बन के रह गएं।
चुन्नू भैया अब बोलें तो बोलें क्या? करें तो करें क्या...? और उस दिन कुछ इस तरह से चुन्नू तिवारी एक युवा नेता की प्रेम कहानी अधूरी रह गई...
अगला भाग भी आएगा जल्द ही 😊🙏
©® पीयूष तिवारी (सोमेश)

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