रोना चाहती थी चीखकर,चिल्लाकर 
लेकिन धीमे-धीमे कहराकर रोयी मैं।
घरवाले सदाएं सून न ले मेरी
मुँह मे रूमाल को दबाकर रोयी मैं।
मेरे पहले प्यार की तरह, तुम्हें शिद्दत से नही चाहता
उसका ये संदेश बार-बार पढकर रोयी मैं।
कहीं किसी की नजर मुझपे न पड़ जाये
खिडक़ी की ओर हरबार झांककर रोयी मैं।
नींदों मे तो सोती रही
पर ख्वाबो मे खुद को जगाकर रोयी मैं।
भरे-भरे घर मे खाली जगह नही था
नहाने के बहाने गुसलखाने मे बैठकर रोयी मैं।
नमी रूकती नही थी आँखों की
हर वक्त काला चश्मा लगाकर रोयी मैं।
आइने मे खुद से नजरें न मिला पायी
कमरें की बत्ती बुझाकर रोयी मैं।
आते-जाते सभी चेहरा पढ़ लेते
चेहरे पे दुपट्टा बांधकर रोयी मैं।
बात करते-करते रुआसा न हो जाऊं
लब पे हँसी चढाकर रोयी मैं।
नशे मे सब दो पल के लिए भूल ही जाऊंगी
प्याले शराब डाली,घूंट-घूंट पीकर रोयी मैं।
परख लिया सबको कोई मेरे लिए पागल नही
इस बात पे घण्टो शोक जताकर रोयी मैं।
आँखों का रोना ही भारी पड़ रहा था
मुश्किल से दिल को चुप कराकर रोयी मैं।
खुली रहती आँखें तो बह जाती
आँसू थमे इसलिए ,आँखें मूंदकर रोयी मैं।
इतना भी क्या बदनसीब बनाने की जरूरत थी
ये बोल खुदा के सामने गिड़गिड़ाकर रोयी मैं।
पंछियों को दबोचने पे जैसे छटपटाते है
उसी तरह कोने मे फड़फड़ाकर रोयी मैं।
सबने पूछा मेरी मायूस होने की वजह
बीमार हूँ ये झूठी खबर फैलाकर रोयी मैं।
लहज़े मे लरजन से बयां हो जाता हाल 
सिसकियों को गाने जैसा गुनगुनाकर रोयी मैं।
ऐसे रोये जा रही थी जैसे आंसूओ का समंदर
रो रही हूँ ये पंक्ति लिखकर रोयी मैं।


       ✍©K.K.kurwanshi (कलमवाली)
                     रायपुर, छत्तीसगढ़