तुम अनजाने जाने पहचाने से लगते हो ।
बिते हुए शाम से लगते हो ।
ठंड के कहर मे रम से लगते हो ।
हाथ मे लिए हुए जाम से लगते हो ।

थकान मे आराम से लगते हो ।
सुबह के भोर से लगते हो ।
अनकहे किस्सों की जुबान से लगते हो ।
रात में चांद से लगते हो ।

पल में अपने‌ , पल में अंजान से लगते हो ।
सच तो ये है‌ , तुम मेरे दिल के जान से लगते हो ।
परायो में अपने से लगते हो ।
मेरी जिंदगी में सुकून से लगते हो ।

मैं प्रयागराज की सम्मान सी ।
तुम उत्तराखण्ड के मान से लगते हो ।
मैं संगम अफसानी सी ।
तुम खूबसूरत वादियों से लगते हो ।

प्रयाग की आफरीन मै ।
तुम नैनीताल के आफसून से लगते हो ।
मैं एहसास कुंभ की ।
तुम हल्द्वानी के जान से लगते हो ।

मैं सरस्वती के रहस्य जैसे ।
तुम गौला के अक्स जैसे लगते हो ।
मैं चौक की व्यवस्थ  सी ।
तुम पहाड़ों में शांत से लगते हो ।

अरैल में सुनसान सी मैं ।
तुम भीमताल के हवा के फिजाअो से लगते हो ।
मैं सबाब यहां की ।
तुम पैगाम दुआअों से लगते हो ।

मैं फलक अरमानों की ।
तुम गहरी खाई से लगते हो ।
मैं जज्बात माघ की ।
तुम हेमकुंड साहिब जन्नत से लगते हो ।

मैं इजतिराब दारागंज की ।
तुम रानीखेत के हयात से लगते हो ।
मैं दरभंगा काॅलोनी में अल्फ्रेड पाकॆ सी ।
तुम बागेश्वर में उत्तराखण्ड काशी जैसे लगते हो ।

मैं धरती कुंभ की ।
तुम पवित्र भूमि देवप्रयाग से लगते हो ।
मैं खुसरो बाग ।
तुम सुदूर शहर गढ़वाल से लगते हो ।

आध्यात्मिक ‌नारायनी आश्रम मैं ।
तुम मंदिर गुप्तकाश से लगते हो ।
मैं स्मारक थ्रोनिल मायने की ।
तुम ऐतिहासिक चंमपावत से लगते हो ।

सेंट कैथेड्रल मैं ‌सिविल लाइन की ।
तुम करामती के पहल कौसानी से  लगते हो।
मैं भवन स्वराज की ।
तुम शहर तुंगनाथ से लगते हो ।

मैं लड़की इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की ।
तुम दौर ग्राफिक एरा हिल से लगते हो ।

      
                    दिव्यांशी निषाद 
               प्रयागराज ,उत्तर प्रदेश