मेरे सिरहाने के तले ,जो रखे थे
तेरे दिए कुछ ख्वाब,
वो आज लापता हैं
मेरे घर की खिड़की भी कुछ खुली सी है।
सुनो!
क्या कल रात तुम मेरी
खिड़की से आये थे।
मेरी दिल की अलमारी में जो रखे थे,
तेरे दिए कुछ सच्चे झूठे से वादे,
वो भी सब तितर बितर पड़े है।
सुनो ,क्या कल रात तुम आये थे
मेरे मन का वो एक छोटा सा कोना
जहाँ मैंने तमाम तेरी यादे सजा रखी थी,
वो भी अब खाली खाली सा है।
क्या तुम साथ वो भी ले गए??
बोलो ना!
क्या कल रात तुम मेरी खिड़की से आये थे।
वो मेरे लवों की एक छोटी सी डिब्बी,
उसमे रखी थी मेरी वो बेशकीमती सी मुस्कान,
वो भी जाने कहाँ गुमशुदा हो गयी।
्बोलो तो
क्या तुम कल रात मेरी खिड़की से आये थे।
और मेरी आँखों के उन आलों में
वो जो तुमसे मिलने की बेहिसाब
हसरतें सँभाल रखीं थीं
वो भी गुम हो गयी।
बोलो तो
क्या तुम कल रात मेरी खिड़की से आये थे??
देखो तो ज़रा ये दिल कितना खाली
खाली सा,और अब इन
हाथों में भी कुछ नहीं ।
मैं किससे कहूँ,और कहूँ भी
तो क्या कहूँ,
की जो ले कर गया सब साथ अपने
वो गैर नहीं कोई
मेरा बेहद अपना था।
अर्चना पंत "आर्ची
लखनऊ

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