हर रुप मेरा हर रुप मे हू
 ममता की  कच्ची धूप में हू।। 
अपनी   छाया मे पल बढकर
 हर क्षण के मौन  मे हू।। 
बचपन मेरा माँ बाप  मेरे 
उनका  एक मात्र  खिलौना हू। 
 दादा दादी के हाथो से 
फिसला सा एक घरौदा हू।।       
अपने भाई  की बहेना हू
 भाभी की बिटिया रानी हू।।
 दीदी की आखो का तारा
 खानदान की राजदुलारी हू।।
  प्रिये प्रेमी की प्रियतमा हू 
 पति को प्राणो से प्यारी हू ।।  
  अपने बच्चो  की ममता हू
  अनवरत मे उनमे बहती हू।।
  अपने पति की  मर्यादा हू 
ननदो की प्रिये सहेली हू ।। 
मान अपमान  का बन्धन हू
 अपने  कुल की मर्यादा हू  ।।
शोषण चाहे जितना कर लो 
मुझे तोड नही पाओगे तुम।। 
 प्रभु के  हाथो की रचना हू 
 हर गुण मेरे अन्दर मे है।।  
कोई भी रोक न पायेगा
बढती जाऊगी पथ पर मे।।   
 अब हार मुझे  स्वीकार नही
 एक निडर सी मै स्त्री हू ।।     
           
हा मैं  स्त्री  हू मै, स्त्री हूँ मैं स्त्री ही हू     

           रीमा ठाकुर