हाँ मुझे फिर से इश्क हुआ।पहले वाला एहसास सच्चा था या फिर ये तो नही जानती,पर ये दूसरा एहसास मेरी रूह को छू जाता है।
पहली बार इश्क मुझे जब हुआ मैं केवल 16 साल की थी।वो मुझे केमिस्ट्री पढ़ाते थे।मैं सिर्फ उन्हें सुनने भर के लिए क्लास जाया करती थी।उनके सब्जेक्ट में हमेशा अच्छे मार्क्स लाने की कोशिश करती।उनके लिए माँ के बनाए आलू के पराठे लाती।उनके लिए ये एहसास मुझे बहुत खुशी देता था।एक दिन जब मैं स्कूल आयी मुझे पता लगा कि वरुण सर नहीं आए है।फ्रेंड्स से पूछने पर पता लगा उनका एक्सीडेंट हो गया है।ये सुनते ही मुझे पता नहीं क्या हुआ।मैं किसी से उनके घर का पता पूछकर उनके घर की ओर निकल गई।उनके घर पहुँची तो एक तीन साल की लड़की घर के बाहर खेल रही थी।अंदर जाकर पता लगा कि वो सर की बेटी थी।अंदर सर की वाइफ सर के गले लगकर रो रहीं थी।उन्हें सर के साथ ऐसे देखकर वहीं जम सी गई।उसी समय उनकी वाइफ ने मुझे देखा तो पूछा"जी आप कौन,मैंने आपको पहचाना नहीं"
अपनी वाइफ की आवाज़ सुनकर सर ने मेरी तरफ देखा और बोला"अरे प्रियल,तुम यँहा?सब ठीक है ना"
"सर वो आपके एक्सीडेंट का सुना तो देखने चली आयी"मैंने जवाब दिया।
"आओ अंदर ,वँहा क्यों खड़ी हो।सनाया ये मेरी सबसे होनहार स्टूडेंट है।और प्रियल ये मेरी सब कुछ,मेरी बीवी"सर ने कहा।
हम दोनों ने एक दूसरे को देखकर स्माइल दी।"सर अब चलती हूँ।वैसे आपकी बेटी बहुत प्यारी है।"मैंने बोला।और मैं बाहर आ गई।
उस दिन मुझे समझ आया कि बचपने में कितनी बड़ी गलती कर रही थी।उसके बाद में पढ़ाई में लग गई।और कुछ दिन बाद सर ने भी स्कूल छोड़ दिया।
जब दूसरी बार इश्क़ हुआ तब में केवल 21 साल की थी।वो मेरी कॉलेज का कल्चरल सेक्रेट्री था।उस दिन हमारे कॉलेज की तरफ से हमे यूनिवर्सिटी लेकर जा रहा था।मैं जिस गाड़ी में थी,वो भी उसी गाड़ी में था।सबसे आगे बैठा वो अपने दोस्तों से बात करने में लगा था।मैं पढ़ाकू लड़की,लड़को से कम ही बात करती थी।हमारी गाड़ी आगे चले जा रही थी,तब बीच में उसने पीछे मुड़कर देखा,वो 6 फुट लंबा,गौरा रंग,और चेहरे पर एक अलग ही रौनक थी।मैं पहली नज़र में ही उसे दिल दे बैठी।पर मैंने अपने चेहरे से जाहिर नही होने दिया।वो पीछे मुड़ा और मुझ पर एक नज़र डाली।और हम सबसे अपने फ़ोन नंबर एक पेपर पर लिखने का बोला।मैंने भी बिना कुछ सोचे अपना नंबर दे दिया।हम यूनिवर्सिटी गए और वहाँ जिस काम के लिए गए थे वो किया और वापिस आ गए।मैंने एक बात नोटिस की थी वो मुझे बीच बीच में चोर निगाहों से देखे जा रहे थे।
उस दिन के बाद हम कुछ दिनों के लिए नहीं मिले।कुछ दिन बाद मैं एकाउंट डिपार्टमेंट में फीस की लाइन में खड़ी थी।तो एक लड़का बीच में आकर टक्कर मार गया।वैसे तो मैं एक बहुत सभ्य लड़की थी हमेशा से।लेकिन लड़को की ऐसी हरकत मुझे सहन नहीं होती थी।मैंने उस लड़को को आवाज़ देते हुए बोला"हे मिस्टर,दिखाई नहीं देता।एक जीती जागती हुई लड़की खड़ी हुई है।"
वो लड़का सॉरी बोलने की बजाय मुझसे बहस करने लगा।ये सब वाक्या एक लड़का दूर खड़े कब से देख रहा था।वो और कोई नवीन सर थे,जो हमे उस दिन यूनिवर्सिटी लेकर गए थे।वो आकर उस लड़के से बोले"तुम्हें लड़कियों से बात करनी की तमीज़ है या नहीं?"
नवीन सर को कॉलेज में सब जानते थे तो वो भी उन्हें कुछ बोल नहीं पाया।बस सॉरी बोलकर वँहा से निकल गया।
नवीन सर को देखकर मेरे दिल जोरो से धड़कने लगा।वो एहसास जिसे में हर रोज अपने सीने में दफन करके कॉलेज आती थी।आज उन्हें देखकर फिर जाग गए।
"तो आप मिस प्रियल है ना।" नवीन सर ने कहा।मैं उनके ख्यालों में इस तरह खोई थी कि मुझे उनकी आवाज़ सुनाई ही नहीं दी।तो उन्होंने थोड़ी जोर से मुझे बोला"मिस प्रियल,कँहा खोई हुई हो आप"
उनकी आवाज़ से मुझे होश आया तो मैंने बोला"जी।क्या कहा आपने।सॉरी"
"कुछ नहीं, मैं आपकी हेल्प कर सकता हूँ,फीस जमा करने में।"नवीन सर ने बोला।
"नहीं,मैं कर लूँगी सर।"मैने जवाब दिया।
"आप सोचती बहुत हो मिस प्रियल"इतना बोलते ही वो मेरा हाथ पकड़कर मुझे डिपार्टमेंट में ले गए।और मैं उनका हाथ अपने हाथ में देखकर एक अलग दुनिया में ही खो गई।
नवीन सर कब से मेरा हाथ छुड़वाने की कोशिश में लगे हुए थे।पर मुझे कुछ ध्यान ही नहीं था।उन्होंने मुझे हिलाते हुए कहा"मिस प्रियल,आप हर बार कौन सी दुनिया में खो जाती हो"
उनके हिलाने से मैं होश में आई तो मैंने कहा"जी आपने कुछ कहा?"
"मेरा हाथ"उन्होंने हाथ की तरफ इशारा करते हुए कहा।
"सॉरी सॉरी"बोलते हुए मैंने उनका हाथ झट से छोड़ दिया।
"आपकी फीस जमा हो गई"अब आप बेफिक्र होकर घर जा सकती हो।हो सकता है आपको आज घर पर कुछ जरूरी काम हो।
उनकी ये बात सुनकर मुझे याद आया कि माँ ने मुझे आज घर जल्दी आने को कहा था।मुझे आज लड़के देखने आने वाले थे।मैंने माँ को बोला भी था कि माँ मुझे मेरा पोस्ट ग्रेजुएशन कर लेने दो फिर ये नाटक करना।पर माँ ने बोला कि "अभी तो केवल देखने आएंगे।लड़का भी किसी अच्छे कॉलज से MBA कर रहा है।आखरी साल है उसका फिर उसके पापा के साथ बिज़नेस करेगा।"
"ठीक है माँ करो नाटक,जो भी आपको करना है।पर मैं दो साल शादी नहीं करूँगी"
इतना बोलते हए मैं वँहा से कॉलेज की ओर निकल गई।मन बेचैन हो गया था शादी की बात सुनकर ।रह रहकर नवीन सर का ख्याल आ रहा था।
"मिस प्रियल,आप फिर कहीं खो गई।"उन्होंने मुझे फिर से हिलाते हुए बोला।
मैं उनकी बात को अनदेखा कर घर की ओर निकल गई।
घर पहुँची तो वँहा पर माँ कितने ही पकवान बनाने में लगे थे।मुझे देखकर माँ बोली "जा जाकर जल्दी तैयार हो जा।वो लोग आते हुए होंगे।"
वैसे तो मुझे बहूत गुस्सा आ रहा था।पर माँ का मान रखने के लिए चुपचाप कमरे में चली गई।कमरे में जाकर नहाई,अलमारी में से पिंक कलर का सूट निकाला,हल्का मेकअप कर तैयार हो गई।तैयार होते होते नवीन सर का चेहरा सामने आने लगा।और फिर आँख भर आयी।
इतनी ही देर में छोटी अंदर आयी और बोली "जीजी वो लोग आ गए है।और लड़का आपसे अकेले में मिलना चाहता है,इसलिए गार्डन में आपका वैट कर रहे है।"
मुझे छोटी की बात सुनकर लड़के पर बहूत गुस्सा आया।सोचने लगी कैसा लड़का है,ना लाज न शर्म बस सीधा मिलने के लिए बोल दिया।
मैं यह सब सोच रही थी कि छोटी मुझे गार्डन में ले आयी।मुझे वँहा छोड़कर वो चली गई।मैं उसे रोकती इससे पहले वो वँहा से चली गई।मुझे गुस्सा तो बहुत आ रहा था,तो मैंने उस लड़के को जाकर बोला"आपको नहीं लगता कि आपको मुझे यहाँ बुलाने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए थी"
लड़का मेरी तरफ पीठ करके खड़ा था मेरी तरफ मुँह करके बोला"रियली,मिस प्रियल।जल्दबाजी करदी मैंने"
मुझे आवाज़ जानी पहचानी लगी,मैंने चेहरा ऊपर करके उन्हें देखा तो देखते ही रह गई।मेरे मुंह से अचानक निकला"नवीन सर आप यँहा कैसे,यँहा तो कोई और मुझसे मिलने आने वाला था ना"
"तो कोई वो मैं नहीं हो सकता क्या?"नवीन सर ने शरारती भरी मुस्कान देते हुए बोला।
"नहीं, आप कैसे?"मेरे मुँह से निकला।
"अच्छा तो ठीक है मैं वापिस चले जाता हूँ।"ऐसा बोलते हुए जाने के लिए मुड़े तो मेरे मुंह से निकल गया"प्लीज मत जाइए, मुझे आपके अलावा किसी ओर से शादी नहीं करनी"
उन्होंने मुझे अपनी तरफ खीचते हुए बोला"अच्छा ।"
"नहीं सॉरी, वो गलती से मुँह से निकल गया"शर्माते हुए मैंने बोला।
"पर मुझे तो केवल आपसे ही करनी है शादी,मिस प्रियल"कहते हुए उन्होंने मेरे होठों को चुम लिया।
"पर आप यहाँ कैसे'कहते हुए मैं उनसे दूर होने लगी।
"ये सब बताने के लिए पूरी ज़िन्दगी पड़ी है।"ये कहते हुए उन्होंने मुझे गले लगा लिया।
मैं भी उनके गले लगकर उनमे दुनिया जंहा की खुशियां तलाशने लग गई थी।
मेरा दूसरा इश्क़ हमेशा हमेशा के लिए मेरा हो गया था।
प्रीति

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