वो फौजी कभी
तो याद कर उसे
जो तेरी यादों के
सहारे बैठी है...!
तुम तो लेकर बैठे
हो देश की कसम
वो तो तुम्हें अपना
खुदा मान बैठी है..!!
तुम वहां हम यहां
लगता है जिन्दगी
भी हम से दूर जा
कर बैठी है...!
चलती नहीं अब ये
सासें तुम बीन वो
तो तुम्हें अपनी
धड़कन मान बैठी है..!!
ना आँखों में नींद है
ना रातों में चैन है
वो तो नींदों से भी अपना
नाता तोड़ बैठी है...!
कैसे ना करें वो तुम्हारा
इंतज़ार वो तो
अपनी सारी जिन्दगी
तुम पर वार बैठी है..!!
ना जाने कौन सी
राह से आ जाएंगे
सोच सोच कर वो
हर राह सज़ा बैठी है...!
करती रहती है ना
जाने कितने ही व्रत
वो तो सातों सनम तुम्हें
अपना बना बैठी है..!!
आरती सुधाकर
सिरसाट बौद्ध
बुरहानपुर मध्यप्रदेश

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