मेरा जीवन "बाध्य नहीं है "
कुप्रथा ,के "रिवाजो से। 

एक थरोहर" मर्यादा की "
बाकी सब "सँस्कारो की।। 

मै सृष्टि की हूँ "धात्री "
पँचबाण से "वंचित हूँ।। 

आलिंगन'हूँ प्रिये "जीवन की "
सौन्दर्य" प्रतिमूर्ति हूँ।। 

मदकता "मोहित "नवयौवन"
जीवन की" परिभाषा हूँ।

छलकाती हूँ" प्रेममाधुरी "
दो "चक्षु की" मादकता हूँ।। 

अब जीवन "आरम्भ हुआ है"
मै "मनु की" श्रद्धा हूँ।

जीवन तरू से हूँ "आच्छादित "
प्रेम मगन मै" बंदिश हूँ।। 



      रीमा महेन्द्र ठाकुर