एक दिन इत्तफाकन ही हम मिल गये थे,
हम दोनों ही एक दूजे से अनजान थे,

जानने के नाम पर चन्द दिनों की पहचान थे,
में तेरे लिये थी अजनवी ,तुम मेरे लिए  अनजान थे,

जाने विधाता को क्या भाया था .
कुछ तो सोचा जो हमें मिलाया था,
न थे अब तुम अजनवी न अब हम अनजान थे।

रफ्ता रफ्ता शिलशिला बड़ गया,
अनजान आदमी अपने अजीजों में मिल गया,
बन चुके अब वो दोनों एक दूजे की जान थे।

वो जागती तो साथ जागता था वो,
वो सिसकती तो आहें भरता था वो,
  जुड़ चुके दोनों के अरमान थे।

कभी वो राधा कहीं श्याम थे,
आज वो थी बिछड़ी हुई शकुंतला ,
और वो भूले उसे दुष्यंत के समान थे।

शाप उनकी प्रीत पर था किसी दुर्वासा का,
मन में प्रीत की जगह स्थान था निराशा का,
अब वनवासी सीता थी वो, और मन में तड़पते  वो राम थे।

जानते थे एक दूसरे का हाले दिल,
जो कभी मिल न सके किनारों का वो थे साहिल,
अजनवी होकर भी न एक दूजे से अनजान थे,

न जाने क्या हुआ क्या थी मजबूरियां,
किसी जिद ने बड़ा दी थी दूरियां,
कभी जहाँ बैठके की थी कितनी बातें आज वो किनारे सूनसान थे।



                    अंजू दीक्षित
                 बदायुं उत्तरप्रदेश