ये मुसाफिर रूक जरा "
पीछे मुडकर थम जरा। 

बन्द थे बरसो से जो"
दो पटे के बीच में। 

खुल रहे हौले से जो "
दरवाजे तेरे मेरे बीच के। 

देहरी पर रखे दीप जो "
जल रहे निस्वार्थ से।

एक प्रचीर को चीर कर"
झाकते प्रकाश बन पटो के बीच से। 

मन व्यथित मत कर पथिक"
चलता चल मत रुक पथिक। 

मिलेगा रास्ता व्यर्थ न समय गवाँ "
खुल गया दरवाजा!

अब तेरे मेरे बीच का"
मेरे तेरे बीच का। 



                  रीमा महेन्द्र ठाकुर