बेटियो का जीवन बादलो सा ही तो होता है। बचपन मे कभी उडकर इधर उधर खिलखिलाना बिना उद्देश्य बस उडते रहना
फिर युवा वस्था भर लेती है। बहुत सारी खुशिया "जैसे बादल भरता है, पानी "जब भरपूर जीवन जीने के लिए बढ़ती है। तो लग जाता है। जीवन पर पटा क्षेप मर्यादा की एक लकीर "काश "बादल सी आजादी होती कही बरसने की "बस यही अलग हो जाती है। थोड़ी सी बादलो "से फिर पूरा जीवन बादलो सा "बादल खुशियो के आँसू गिरता है। वो आंसू मोती बन जाते हैं। जमी की क्षुद्धा शान्त हो जाती है। और जब बेटिया अवितरित होती है। पत्नी, बहू ,भाभी, माँ, जाने कितने रिश्ते जी लेती है। और खोने लग जाती है अपना अस्तित्व एक बेटी का और पहन लेती है। एक मुखौटा "जैसे बादल खोता है अपना अस्तित्व अपना जल जमी को अर्पण कर पर खुश की उसने जो अर्पण किया। वो जाने कितनो के लिए आशीर्वाद बन जाऐगा। बस बेटिया भी सारे रूप अपना कर खुश हो बसा लेती है। अपना घरोदा और जी लेती है। खुशी खुशी अपनी ज़िन्दगी "बादल प्रकृति का नियम अपना कर लुटा देता है अपना सब कुछ, और बेटी समाज का"" बस एक गुजरिश है बेटी का चाहे जो रूप हो उसे मान सम्मान दे। वो आपके हर कदम पर आपके साथ है। मेरा मकसद बस इतना हैं। चाहे वो स्त्री हो या पुरुष। बस बेटियों को हर रूप में प्यार और सम्मान दे।
रीमा महेन्द्र ठाकुर

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