मायके में जब पहुंची
इंतजार सब कर रहे थे मेरा
घर का आंगन या हो देहरी
या हरियाला तुलसी चौरा
जब खोली अपनी बन्द अलमारी
कपड़े थे जिनमें सिलवटों वाले
पर संजो के रखती है माँ
बेटी पहनेगी घर आके
रसोई को महका रहा था
भोजन मेरी पसन्द वाला
बेटी जब घर आती है
माहौल होता उत्सव वाला
जाकर देखा बैठक में तो
शतरंज की बिसात बिछाए
बोले पापा आओ बेटा
आज खेल में तुम्हे हराए
घर के एक कोने में बैठा
रस्ता देख रहा था बचपन
बोला मुझे सदा पाओगी
जब भी तुम इस घर आओगी
प्रीति ताम्रकार
जबलपुर

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