कल रात मे चुप बैठी थी
एक गहरी खामोशी मे खोई थी
ना जाने कहाँ से हवाएं तेज़ चलने लगी
यादों की अँधिया रह रह के ख्यालों मे मचलने लगी
मै भी कुछ घबराइए सी बाते उस हरजाई की मुझको सताने लगी
आने लगी थी मुझे को भी अब रुलाई सी
पन्नों पर पन्ने पलटती रही मोती की माला बनी बरखा
आँखो से तस्वीरें को धोती रही
कौन से परदेश मे जाकर बस गए हो अर्श पर गड़ी नज़ारे ये सवाल करती रही
ना चिट्टी है ना ही कोई देता है मुझको तेरा सन्देश
नजाने कौन सा है वो तेरा देश
जहाँ की फिजायें भी नहीं गुजरती छूके तुझे
मुझे ये एहसास भी नहीं दिलाती तेरे होने का
गम तेरे जाने के हजारों इस दिल पे हमने खाए है
खून का एक एक कतरा अश्कों से तेरी यादों
मे हमने बहाए है
आलिया खान

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