उस मकान की दीवारें कुछ 
सीली सी है, बेमौसम   की
बरसात  ने  भिगोई थी उस 
समय अभी तक गीली सी है।।

कल   गई   थी   मै   वहां,
देखकर आंखे भर आईं थी
मेरी,, पुराने दिनों की यादें
इक  फिल्म  की  तरह मन 
में    चल    रही   थी  मैंने
पकड़ने कि  कोशिश  की
पर आंखों से सब ओझल था।। 

कितनी यादें थी अपनी,
यहां एक  एक पल की
एक  कोने   में   तुम्हारी
मेज थी जहां तुम अपनी
नोवल   पड़ा  करते   थे
और   कहा   करते   थे ,
जानू ,, एक  काम  करना
मै  कहा  करती थी, कुछ
भी   काम   चलेगा,   पर 
चाय   की   मत   बोलना
चाय   मुझे   सौतन   सी 
       लगती है।।



                 तृषा वर्मा