मृणलिनी बेटा थोडा धीरज रखो कुछ ही समय की बात है। सब ठीक हो जाएगा। बेटी की वेदना मृणलिनी की माँ, शोभा से देखी न जा रही थी।
वो उसकी सास के पास बार बार जा कर मिन्नते कर रही थी।
बेवाई जी पूरा दिन निकल गया"अब तो रात होने आयी, बिटिया की हालत अब दर्द सहन करने की नहीं है। आप हमे बिटिया को एक बार हास्पिटल ले जाने दो "
हमारे परिवार मे अब तक कोई हास्पिटल प्रसव के लिए नहीं गया ये सब शहर वालो के चोचले है। अभी शन्तो दाई आती होगी। वो ही सब कर देगी "और बच्चा हमारी गोद में होगा।
आजकल सब इतना आसान नहीं है खान पान अब पहले जैसा नहीं रहा "शोभा जी सहमते हुऐ बोली "
सब आसान है। बस आजकल की लडकिया और आप जैसे माँ बाप उन्हें बिगाड कर रख देते है।
हमारी सोना दो साल छोटी है बहू से दो बच्चे है पर मजाल है ।
तभी शन्तो दाई सूरज के साथ वही आ गई "अम्मा राम राम वो अम्मा के पैरो में झुक गई "ठीक है जाओ सम्हालो बहू को ऐ बहू की मां कब से हास्पिटल जाने की जिद कर रही हैं।
कहा है बहुरिया "अम्मा ने हाथ कोठरी की तरफ इशारा किया।
मृणलिनी की चीख से शोभा जी कोठरी की ओर भागी "सूरज भी घबरा गया। वो मृणलिनी के पास जाना चाहता था।
पर अम्मा के डर की वजह से हिम्मत न हुई।
शन्तो दाई ने मृणलिनी की स्थिति सम्भालने की कोशिश की पर सम्भाल न पायी"
एक तीव्र वेदना के साथ मृणलिनी ने हमेशा के लिए आँखै बन्द कर ली,
और घबराहट की वजह से नाल काटते समय शन्तो के हाथ काँप रहे थे। और शन्तो की गलती से उस नवजात शिशु ने दुनिया में आने के साथ ही अलविदा बोल दिया।
शोभा जी अपने को सम्भाल न पायी और बेसुध हो गई "पूरे घर में मातम छा गया। मृणलिनी की सास की जिद और लापरवाही के चलते शोभा जी ने अपनी बेटी खो दी "और सूरज ने अपना बेटा "
शोभा जी अपनी बेटी तो न ला सकी पर अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया कि अन्धविश्वास दूर करेगी और महिलाओं मे जागरुकता लाऐगी
रीमा महेन्द्र ठाकुर

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