तुम्हारे प्यार की,
तपिश में जलते हैं
तड़पते है
फिर भी तुम्हीं से
प्यार करते हैं।
बे वफ़ा हो गए तुम ,
पर हम नहीं कहते,
फिर भी हम इसका
इल्जाम अपनी कमियों
के सिर धरते हैं।
परदेशी हो गए जो पिया,
उसमें उनकी क्या खता,
हमारे जैसे बिरहा में
वो भी तड़पते हैं।
हकीकत में शायद याद न हो,
पर हम दावे से कहते हैं,
रातों को तेरे ख़्वाबों में,
हम ही सबरते हैं।
कभी दूरियों की तपन से,
हम नहीं जलते,
सुन रख्खा है लोगों से,
जो जितना तपते हैं
उतना ही बनके कुंदन निखरते हैं।
अंजू दीक्षित
उत्तर प्रदेश

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